जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग को स्वीडन के दो सांसदों ने 2020 के नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया है। सांसदों ने कहा कि थनबर्ग ने जलवायु संकट उत्सर्जन को कम करने के लिए राजनीतिज्ञों की आंख खोलने और पेरिस समझौते की अनुपालना के लिए कठोर मेहनत की है जो कि एक तरह से शांति के लिए एक पहल है।
आइए आपको बताते हैं कि कौन हैं ग्रेटा थनबर्ग, जिन्हे नोबेल पुरस्कार के लिए नामित किया गया है।
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ग्रेटा थनबर्ग (फाइल फोटो)
- फोटो : Instagram
संयुक्त राष्ट्र में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर 16 साल की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के सवालों ने दुनियाभर के नेताओं को झकझोर दिया। ग्रेटा ने युवा पीढ़ी की आवाज को दुनिया के सामने रखते हुए कहा था कि हमें समझ आ रहा है कि जलवायु परिवर्तन पर आपने हमारे साथ धोखा किया है और अगर आपने कुछ नहीं किया तो युवा पीढ़ी आपको माफ नहीं करेगी। ग्रेटा के इस भाषण के बाद दुनियाभर में उनकी चर्चा होने लगी। उन्हें जलवायु परिवर्तन की बुलंद करने की आवाज के रूप में देखा जाने लगा।
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ग्रेटा थनबर्ग (फाइल फोटो)
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वर्तमान समय में लोग जलवायु परिवर्तन को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं, लेकिन ग्रेटा के वैश्विक नेताओं से चुभने वाले सवालों को पूछकर उन्हें इस मुद्दे पर विचार करने को मजबूर किया है। वह अपना विद्यालय छोड़कर लोगों को पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारियों का अहसास दिलाने का काम करती हैं। साथ ही ग्रेटा दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन को लेकर कार्य करती है। वह अमेरिका से लेकर लंदन और फ्रांस में लोगों को जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के प्रति जागरूक करने में लगी हुई हैं।
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ग्रेटा थनबर्ग (फाइल फोटो)
- फोटो : Instagram
ग्रेटा थनबर्ग ने जलवायु परिवर्तन को लेकर अपने विद्यालय से स्ट्राइक फॉर क्लाइमेट या फ्यूचर फॉर फ्राइडे कैंपेन की शुरुआत की, जो पूरी दुनिया में मशहूर है। इस अभियान के तहत ग्रेटा ने शुक्रवार को विद्यालय जाना छोड़ दिया। वह हर शुक्रवार स्वीडन की संसद के बाहर तख्ती लेकर प्रदर्शन करतीं हुईं दिख जाती हैं। सांसदों के अलावा वह वहां से गुजरने वाले लोगों से दुनिया को बचाने का आग्रह करती हैं।
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ग्रेटा थनबर्ग
- फोटो : पीटीआई
जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को लेकर ग्रेटा दुनियाभर के लोगों के लिए एक आइकन बन चुकी है। वह दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर बड़े-बड़े भाषण देती हैं। नवंबर 2018 में उनके अभियान में 24 देशों के लगभग 17 हजार छात्रों ने हिस्सा लिया था। मार्च 2019 तक उनके अभियान से 135 देशों के 20 लाख बच्चे जुड़ चुके थे। वहीं पिछले साल अगस्त में यह संख्या बढ़कर 36 लाख हो गई।