जब भी पाकिस्तान में भारत के किसी अपराधी को शरण दी जाती है पूरी दुनिया की निगाहें उस तरफ घूमती हैं। 1993 में मुंबई बम विस्फोटों के बाद मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम के पाकिस्तान भागने और वहां बस जाने की खबरें आईं तो भारत ने इसे एक बहुत बड़ा मुद्दा बना लिया।
भारत से भागे डाकू को पाकिस्तान ने दी थी पनाह, पत्नी ने छोड़ दिया था सिंदूर लगाना
मशहूर किताब 'द पीपुल नेक्स्ड डोर- द क्यूरियस हिस्ट्री ऑफ इंडियाज रिलेशन विद पाकिस्तान' के लेखक और पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रह चुके डाक्टर टीसीए राघवन बताते हैं, "इसके बारे में मैंने एक फाइल देखी थी जो मेरे पास डि-क्लासिफाई करने के लिए आई थी ताकि उसे नैशनल आर्काइव्स में भेजा जा सके।
ये मामला इतना महत्वपूर्ण था कि इसपर दोनों देशों के बीच काफी ऊँचे स्तर पर बात हुई थी। दिक्कत ये थी कि इस मांग को अमली जामा पहनाने के लिए भारत के पास कोई कानूनी ढांचा नहीं था क्योंकि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि पर दस्तखत नहीं हुए थे।"
वे कहते हैं, "जब भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त के भूपत डाकू को भारत लाने के सारे प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि वो राजनीतिक रूप से इतनी कमजोर है कि वो जनमत की उपेक्षा कर भूपत को भारत को सौंपने की हिम्मत नहीं कर सकती।"
सौराष्ट्र के राजनेताओं के दबाव और भारतीय मीडिया में इस बारे में लगातार चर्चा की वजह से इस विषय पर जुलाई 1956 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा के बीच भी बातचीत हुई।
इसके बाद नेहरू ने विदेश मंत्रालय की फाइल पर लिखा, "पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने मेरे सामने भूपत का मामला उठाया। मेरे खयाल से इस बारे में पहल उनकी तरफ से हुई। श्री बोगरा ने कहा कि वो पूरी तरह से इस बात पर सहमत हैं कि भूपत को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।
उसे भारत वापस भेजने के बारे में उन्होंने ये कह कर हाथ झाड़ लिए कि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि नहीं है। उन्होंने ये कहा कि उसे भारतीय प्रशासन को सूचित करने के बाद भारतीय सीमा पर छोड़े जाने की बात सोची जा सकती है।"
लेकिन किसी तरह यह प्रस्ताव भारतीय मीडिया में लीक हो गया और फिर पाकिस्तान इस प्रस्ताव से पीछे हट गया। भारतीय मीडिया में उन दिनों भूपत से संबंधित खबरें छाई रहती थीं। ब्लिट्ज ने अपने अप्रैल, 1953 के अंक में सुर्खी लगाई थी, "क्या भूपत पाकिस्तानी सेना के लिए भारतीय डाकुओं की भर्ती कर रहा है?"
इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भूपत पाकिस्तानी सेना के खुफिया विभाग के लिए भारतीय डकैतों की भर्ती कर रहा है और इस टॉप सीक्रेट मिशन के लिए भारत पाकिस्तान सीमा के नजदीक घूम रहा है।
टीसीए राघवन बताते हैं, "मीडिया अटकलों के बीच भूपत की रणनीति ये थी किसी तरह उसे भारत न भेजा जाए, जहां उसे फांसी पर चढ़ाया जाना करीब-करीब तय था। एक समय ऐसा आया कि उसके कुछ समर्थकों ने सड़कों पर नाटक करके उसके लिए चंदा जमा करना शुरू किया।
उन्होंने कुल 1500 रुपये जमा किए, जो उस जमाने में छोटी रकम नहीं थी। इस सबसे भूपत इतना उत्साहित हुआ कि उसे एक फिल्म बनाने की योजना बनाई जिसमें जूनागढ़ पर भारतीय सेना के कब्जे को दिखाया जाता। उसका तर्क था कि इस तरह की फिल्म से भारत के खिलाफ पाकिस्तान के प्रोपेगंडा को बढ़ावा मिलेगा।"