कुछ कहानियां पदकों से नहीं, फैसलों से लिखी जाती हैं। कुछ खिलाड़ी इतिहास जीतते हैं, लेकिन कुछ इतिहास बदल देते हैं। अनाहत सिंह की कहानी भी ऐसी ही है। आज पूरी दुनिया उन्हें विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियन के रूप में जानती है। कनाडा में उन्होंने फाइनल में मिस्र की दूसरी वरीयता प्राप्त रुकय्या सालेम को 11-3, 11-7, 11-9 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम किया।
इसके साथ ही वह विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गईं। इतना ही नहीं, उन्होंने 15 वर्षों से इस प्रतियोगिता पर चले आ रहे मिस्र के एकछत्र राज का भी अंत कर दिया। लेकिन इस चमचमाते स्वर्ण पदक के पीछे एक छोटी-सी बच्ची का सपना छिपा है, जो स्क्वैश कोर्ट पर नहीं, बैडमिंटन कोर्ट पर शुरू हुआ था।
जब छह साल की बच्ची की आंखों में पीवी सिंधू बस गईं
अनाहत का जन्म 13 मार्च, 2008 को हुआ था। साल 2014 की बात है, दिल्ली में इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट चल रहा था। स्टैंड में बैठी छह साल की एक बच्ची पूरे ध्यान से पीवी सिंधू को खेलते हुए देख रही थी। हर स्मैश, हर रैली और हर जीत उसके दिल में उतर रही थी। उस दिन उसने घर लौटकर कहा- मुझे भी खिलाड़ी बनना है। वह बच्ची थीं अनाहत सिंह। उन्होंने बैडमिंटन खेलना शुरू किया। स्थानीय टूर्नामेंट जीते। रैकेट हाथ में था, सपने आंखों में थे और मंजिल साफ दिखाई दे रही थी। उन्हें क्या पता था कि जिंदगी उनके लिए एक दूसरा रास्ता चुन चुकी है।
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अमीरा और अनाहत सिंह
- फोटो : ANI
जिंदगी ने पूछा- एक रास्ता चुनोगी?
घर में खेल का माहौल था। पिता गुरशरण सिंह वकील हैं, मां तानी वढेरा सिंह इंटीरियर डिजाइनर। दोनों युवावस्था में हॉकी खेल चुके थे। बड़ी बहन अमीरा सिंह स्क्वैश खेलती थीं और देश की बेहतरीन जूनियर खिलाड़ियों में गिनी जाती थीं। अनाहत बहन के साथ स्क्वैश कोर्ट जाने लगीं। पहले सिर्फ देखने, फिर मजे के लिए खेलने और फिर धीरे-धीरे मुकाबले खेलने। कुछ समय तक वह बैडमिंटन और स्क्वैश दोनों खेलती रहीं। लेकिन एक दिन परिवार के सामने सवाल था- दो खेल या एक सपना?
टूर्नामेंट, यात्राएं, अभ्यास... दोनों खेलों को साथ लेकर चलना आसान नहीं था। आठ साल की उम्र में अनाहत ने शायद अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया। उन्होंने बैडमिंटन छोड़ दिया। जिस खेल से प्यार था, उसे अलविदा कहा। स्क्वैश को गले लगा लिया। यही वह पल था जिसने आगे चलकर भारतीय खेल इतिहास बदल दिया। कभी-कभी जिंदगी आपको वह नहीं देती जो आप चाहते हैं, बल्कि वह देती है जिसके लिए आप बने होते हैं।
बहन सिर्फ बहन नहीं, पहली कोच भी बनीं
हर चैंपियन के पीछे कोई न कोई अनदेखा चेहरा होता है। अनाहत के लिए वह चेहरा उनकी बड़ी बहन अमीरा थीं। उन्होंने सिर्फ खेल नहीं सिखाया, बल्कि कोर्ट पर सोचने का तरीका भी सिखाया। इसके बाद अमजद खान, अशरफ हुसैन और फिर रित्विक भट्टाचार्य जैसे कोचों ने उनके खेल को नई ऊंचाई दी। लेकिन मेहनत तो अनाहत को ही करनी थी। सुबह की ट्रेनिंग, स्कूल, फिर शाम की प्रैक्टिस। जब दूसरे बच्चे छुट्टियां मनाते थे, तब वह अगले टूर्नामेंट की तैयारी करती थीं।
रिकॉर्ड बनाना उनकी आदत बन गया
2019 में ब्रिटिश ओपन जूनियर जीतने वाली पहली भारतीय बनीं। फिर यूएस ओपन जूनियर, एशियन जूनियर चैंपियनशिप, जर्मन ओपन, डच ओपन, ब्रिटिश जूनियर ओपन...हर साल उनकी ट्रॉफियों की अलमारी बड़ी होती गई, लेकिन उनके सपने ट्रॉफियों से भी बड़े थे।