{"_id":"5e14475e8ebc3e87df0294bf","slug":"vivekananda-jayanti-swami-vivekananda-best-stories","type":"photo-gallery","status":"publish","title_hn":"vivekananda jayanti: विवेकानंद का वह बेहतरीन किस्सा जब उन्होंने गोरक्षक से पूछे कई मुश्किल सवाल","category":{"title":"Wellness","title_hn":"पॉज़िटिव लाइफ़","slug":"wellness"}}
vivekananda jayanti: विवेकानंद का वह बेहतरीन किस्सा जब उन्होंने गोरक्षक से पूछे कई मुश्किल सवाल
Wed, 08 Jan 2020 09:16 AM IST
योगेश जोशी
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: योगेश जोशी
Updated Wed, 08 Jan 2020 09:16 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बात फरवरी 1897 की है। कोलकता का बाग बाजार इलाका, स्वामी विवेकानंद रामकृष्ण परमहंस के एक भक्त प्रियनाथ के घर पर बैठे थे। रामकृष्ण के कई भक्त उनसे मिलने वहां पहुंचे थे, तरह-तरह के मुद्दों पर चर्चा हो रही थी। तभी वहां गोरक्षा के एक प्रचारक आ पहुंचे और स्वामी विवेकानंद ने उनसे बात करने लगे। स्वामी विवेकानंद और गोरक्षा के प्रचारक संन्यासी के बीच एक दिलचस्प संवाद हुआ जिसे शरतचंद्र चक्रवर्ती ने बांग्ला भाषा में कलमबंद किया था। यह संवाद स्वामी विवेकानंद के विचारों के आधिकारिक संकलन का हिस्सा भी बना।
स्वामी विवेकानंद ने गोरक्षा के काम में जुटे इस प्रचारक से क्या कहा होगा? थोड़ी कल्पना कीजिए....
अमरीका के शिकागो में 1893 में विश्व धर्म संसद में हिन्दू धर्म की पताका लहराकर लौटे थे विवेकानंद, गेरुआ वस्त्र पहनने वाले संन्यासी ने गोरक्षक जो कुछ कहा उसकी कल्पना करना आपके लिए आसान नहीं होगा।
अमरीका के शिकागो में 1893 में विश्व धर्म संसद में हिन्दू धर्म की पताका लहराकर लौटे थे विवेकानंद, गेरुआ वस्त्र पहनने वाले संन्यासी ने गोरक्षक जो कुछ कहा उसकी कल्पना करना आपके लिए आसान नहीं होगा।
विवेकानंद-गोरक्षक संवाद पढ़िए
गोरक्षक ने भी साधु-संन्यासियों जैसे कपड़े पहने थे। सर पर गेरुए रंग की पगड़ी थी। वह बंगाल से बाहर हिन्दी पट्टी के लग रहे थे, विवेकानंद अंदर के कमरे से गोरक्षक स्वामीजी से मिलने आए, अभिवादन के बाद गोरक्षा के प्रचारक ने गौ माता की एक तस्वीर उन्हें दी। इसके बाद वे गोरक्षा के प्रचारक से बातचीत करने लगे। बेहतर तो यही है, इन दोनों की बातचीत वैसे ही पढ़ी जाए जैसा कंप्लीट वर्क्स ऑफ विवेकानंद में दर्ज है।
विवेकानंद: आप लोगों की सभा का उद्देश्य क्या है?
प्रचारक: हम देश की गोमाताओं को कसाइयों के हाथों से बचाते हैं। स्थान-स्थान पर गोशालाएं स्थापित की गई हैं। यहां बीमार, कमज़ोर और कसाइयों से मोल ली हुई गोमाताओं को पाला जाता है।
विवेकानंद: यह तो बहुत ही शानदार बात है। सभा की आमदनी का जरिया क्या है?
प्रचारक: आप जैसे महापुरुषों की कृपा से जो कुछ मिलता है, उसी से सभा का काम चलता है।
विवेकानंद: आपकी जमा पूंजी कितनी है?
प्रचारक: मारवाड़ी वैश्य समाज इस काम में विशेष सहायता देता है, उन्होंने इस सत्कार्य के लिए बहुत सा धन दिया है।
विवेकानंद: मध्य भारत में इस समय भयानक अकाल पड़ा है। भारत सरकार ने बताया है कि नौ लाख लोग अन्न न मिलने की वजह से भूखों मर गए हैं, क्या आपकी सभा अकाल के इस दौर में कोई सहायता देने का काम कर रही है?
प्रचारक: हम अकाल आदि में कुछ सहायता नहीं करते, यह सभा तो सिर्फ़ गोमाताओं की रक्षा करने के उद्देश्य से ही स्थापित हुई है।
विवेकानंद: आपकी नजरों के सामने देखते-देखते इस अकाल में लाखों-लाख मानुष मौत के मुंह में समा गए, पास में बहुत सारा पैसा होते हुए भी क्या आप लोगों ने एक मुट्ठी अन्न देकर इस भयानक अकाल में उनकी सहायता करना अपना कर्तव्य नहीं समझा?
प्रचारक: नहीं, यह लोगों के कर्मों का फल है- पाप की वजह से ही अकाल पड़ा है। जैसा 'कर्म होगा है, वैसा ही फल' मिलता है।
गोरक्षक ने भी साधु-संन्यासियों जैसे कपड़े पहने थे। सर पर गेरुए रंग की पगड़ी थी। वह बंगाल से बाहर हिन्दी पट्टी के लग रहे थे, विवेकानंद अंदर के कमरे से गोरक्षक स्वामीजी से मिलने आए, अभिवादन के बाद गोरक्षा के प्रचारक ने गौ माता की एक तस्वीर उन्हें दी। इसके बाद वे गोरक्षा के प्रचारक से बातचीत करने लगे। बेहतर तो यही है, इन दोनों की बातचीत वैसे ही पढ़ी जाए जैसा कंप्लीट वर्क्स ऑफ विवेकानंद में दर्ज है।
विवेकानंद: आप लोगों की सभा का उद्देश्य क्या है?
प्रचारक: हम देश की गोमाताओं को कसाइयों के हाथों से बचाते हैं। स्थान-स्थान पर गोशालाएं स्थापित की गई हैं। यहां बीमार, कमज़ोर और कसाइयों से मोल ली हुई गोमाताओं को पाला जाता है।
विवेकानंद: यह तो बहुत ही शानदार बात है। सभा की आमदनी का जरिया क्या है?
प्रचारक: आप जैसे महापुरुषों की कृपा से जो कुछ मिलता है, उसी से सभा का काम चलता है।
विवेकानंद: आपकी जमा पूंजी कितनी है?
प्रचारक: मारवाड़ी वैश्य समाज इस काम में विशेष सहायता देता है, उन्होंने इस सत्कार्य के लिए बहुत सा धन दिया है।
विवेकानंद: मध्य भारत में इस समय भयानक अकाल पड़ा है। भारत सरकार ने बताया है कि नौ लाख लोग अन्न न मिलने की वजह से भूखों मर गए हैं, क्या आपकी सभा अकाल के इस दौर में कोई सहायता देने का काम कर रही है?
प्रचारक: हम अकाल आदि में कुछ सहायता नहीं करते, यह सभा तो सिर्फ़ गोमाताओं की रक्षा करने के उद्देश्य से ही स्थापित हुई है।
विवेकानंद: आपकी नजरों के सामने देखते-देखते इस अकाल में लाखों-लाख मानुष मौत के मुंह में समा गए, पास में बहुत सारा पैसा होते हुए भी क्या आप लोगों ने एक मुट्ठी अन्न देकर इस भयानक अकाल में उनकी सहायता करना अपना कर्तव्य नहीं समझा?
प्रचारक: नहीं, यह लोगों के कर्मों का फल है- पाप की वजह से ही अकाल पड़ा है। जैसा 'कर्म होगा है, वैसा ही फल' मिलता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
गोरक्षक की यह बात सुनकर स्वामी विवेकानंद की बड़ी-बड़ी आंखों में मानो जैसे ज्वाला भड़क उठी। मुंह गुस्से से लाल हो गया, मगर उन्होंने अपनी भावनाओं को किसी तरह दबाया।
स्वामी विवेकानंद ने कहा, 'जो सभा-समिति इंसानों से सहानुभूति नहीं रखती है, अपने भाइयों को भूखे मरते देखते हुए भी उनके प्राणों की रक्षा करने के लिए एक मुट्ठी अनाज तक नहीं देती है लेकिन पशु-पक्षियों के वास्ते बड़े पैमाने पर अन्न वितरण करती है, उस सभा-समिति के साथ मैं रत्ती भर भी सहानुभूति नही रखता हूं। इन जैसों से समाज का कोई विशेष उपकार होगा, इसका मुझे विश्वास नहीं है।'
स्वामी विवेकानंद ने कहा, 'जो सभा-समिति इंसानों से सहानुभूति नहीं रखती है, अपने भाइयों को भूखे मरते देखते हुए भी उनके प्राणों की रक्षा करने के लिए एक मुट्ठी अनाज तक नहीं देती है लेकिन पशु-पक्षियों के वास्ते बड़े पैमाने पर अन्न वितरण करती है, उस सभा-समिति के साथ मैं रत्ती भर भी सहानुभूति नही रखता हूं। इन जैसों से समाज का कोई विशेष उपकार होगा, इसका मुझे विश्वास नहीं है।'
विज्ञापन
फिर विवेकानंद कर्म फल के तर्क पर आते हैं, वे कहते हैं, "अपनों कर्मों के फल की वजह से मनुष्य मर रहे हैं- इस तरह कर्म की दुहाई देने से जगत में किसी काम के लिए कोशिश करना तो बिल्कुल बेकार साबित हो जाएगा। पशु-पक्षियों के लिए आपका काम भी तो इसके अंतर्गत आएगा। इस काम के बारे में भी तो बोला जा सकता है- गोमाताएं अपने-अपने कर्मफल की वजह से ही कसाइयों के हाथ में पहुंच जाती हैं और मारी जाती हैं इसलिए उनकी रक्षा के लिए कोशिश करना भी बेकार है।"