चाणक्य नीति: ये चार अवस्थाएं मनुष्य के लिए होती हैं विष के समान, करना चाहिए सुधार
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शरीर को स्वस्थ रखने और जीवन के लिए लिए भोजन आवश्यक है, स्वादिष्ट भोजन हर किसी को पसंद होता है परंतु अपनी भूख और पाचन शक्ति के अनुसार ही भोजन करना चाहिए। चाणक्य नीति कहती है कि क्षमता से अधिक भोजन जो पाचाया न जा सके तो यह अवस्था व्यक्ति के लिए विष के समान हो जाती है। इसलिए व्यक्ति को इसमें सुधार करना चाहिए।
चाणक्य नीति के अनुसार गरीबी व्यक्ति के लिए विष के समान है। कहने का तात्पर्य यह है कि जब मनुष्य की आर्थिक स्थिति मजबूत न हो वह गरीब,दरिद्र हो तो शादी और घर जैसे भार व्यक्ति को विष के समान लगते हैं। छोटी-छोटी चीजों को प्राप्त करने के लिए भी व्यक्ति को बहुत संघर्ष करना पड़ता है। इसलिए आचार्य चाणक्य के मुताबिक इस स्थिति में सुधार के प्रयास करते रहने चाहिए।
वृद्धवस्था एक ऐसी अवस्था है जब व्यक्ति के पास पूरे जीवन का अनुभव होता है। जिससे वह समाज को सही राह दिखा सकता है। वृद्धावस्था में जो व्यक्ति दान-पुण्य धार्मिक कार्य और समाजहित के कार्य को त्यागकर प्रेम प्रसंग में फंस जाता है तो यह अवस्था विष के समान हो जाती है। इससे व्यक्ति के धन, सम्मान सभी चीजों का नाश हो जाता है।
चाणक्य नीति के अनुसार ज्ञान का दोहराव बहुत आवश्यक होता है क्योंकि निरंतर अभ्यास से ही व्यक्ति पारंगत बनता है। अभ्यास न करने की अवस्था में वो ज्ञान विष समान हो जाता है।