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पीएम ने की केदारनाथ मंदिर में पूजा, जानें मंदिर से जुड़े रहस्य

Thu, 04 May 2017 10:35 AM IST
amarujala.com-written by: किरण सिंह
amarujala.com-written by: किरण सिंह Updated Thu, 04 May 2017 10:35 AM IST
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bheem shila saved kedarnath temple from flash flood

बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक केदारनाथ धाम के कपाट बुधवार खुलें, जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी दर्शन करने पहुंचे। उत्तराखंड में हिमालय पर्वत की गोद में स्थित केदारनाथ धाम के कपाट श्रद्घालुओं के लिए छह माह के लिए खुलते है और बाद में सर्दियों में भारी बर्फबारी के बाद यहां आने का रास्ता बंद हो जाता है। चार धामों में से एक धाम केदानाथ धाम हर साल लाखों की संख्या में श्रद्घालु आते हैं। इस धाम प्रति लोगों की अटूट श्रृद्घा है, लेकिन जून 2013 में यहां आए भयंकर बाढ़ और भूस्‍खलन के बाद भीम शीला के प्रति भी लोगों की श्रद्घा बढ़ गई। जानिए आखिर कैसे होने लगी चट्टान की पूजा



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bheem shila saved kedarnath temple from flash flood

जून 2013 में उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में अचानक ही बाढ़ आ गई। इसके साथ ही भूस्‍खलन भी होने लगा, जिससे सबसे अधिक प्रभावित केदारनाथ धाम हुआ। यह आपदा इतनी भयावह थी इसके आस पास बने होटल, धर्मशाला सब कुछ अपने साथ बहाकर ले गई। यही नहीं मंदिर की दीवारें भी इससे बच नहीं पाई और बाढ़ के साथ बह गई, लेकिन इस ऐतिहासिक मंदिर का मुख्‍य हिस्सा और सदियों पुराना गुंबद सुरक्षित रहा।

bheem shila saved kedarnath temple from flash flood

प्रलय के बाद भी मंदिर का उसी भव्यता के साथ खड़ा रहना किसी अचरज से कम नहीं था। आज भी लोग इसे किसी चमत्कार से कम नहीं मानते। हालांकि मंदिर को उस प्रलय से बचाने में भीम शीला ने अहम योगदान रहा, जिसकी लोग अब पूजा करने लगे।

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बाढ़ और भूस्‍खलन के बाद बड़ी बड़ी चट्टाने मंदिर के पास आने लगी और वहीं रूक गई, जो अभी तक जस की तस है, लेकिन उसी में से एक चट्टान भी आई, जो मंदिर का कवच बन गई। इस चट्टान की वजह से ही मंदिर की एक ईंट को भी नुकसान नहीं पहुंचा। जिसके बाद इस चट्टान को भीम शिला का नाम दिया गया। यह चट्टान मंदिर के परिक्रमा मार्ग के बिल्कुल पीछे है।

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वैज्ञानिकों की मानें तो केदारनाथ का मंदिर 400 वर्षो तक बर्फ से दबा रहा था। माना जाता है कि 13वीं से 17वीं सदीं का दौर एक छोटा हिमयुग का समय था और उसी दौरान यह मंदिर बर्फ के नीचे दब गया था, जो 17वीं तक रहा। बर्फ जब पीछे हटी तो उसके पीछे हटने के निशान आज भी मंदिर में मौजूद है। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि मंदिर ग्लेशियर के अंदर नहीं था, बल्कि बर्फ से ही दबा था।

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