साल भर में कुल 24 एकादशी आती है, जिसमें देवीशयनी और देवप्रबोधनी एकादशी सबसे बड़ी होती है। देव देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु सोते हैं और देवप्रबोधनी के दिन जगते हैं, लेकिन इन दोनों एकादशियों के अलावा एक एकादशी है मोक्षदा एकादशी। यह एकादशी अपने नाम के अनुसार व्रती को मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है।
हर साल यह एकादशी मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष में आती है। इस वर्ष यह तिथि 30 नवंबर को है। इस एकादशी का महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन का मोह भंग करने के लिए मोक्ष प्रदायिनी भगवत गीता का उपदेश दिया था। इसलिए इस दिन को गीता जयंती के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि गीता जयंती यानी मोक्षदा एकादशी के दिन भगवत गीता की पूजा करके आरती करनी चाहिए, इसके पश्चात गीता का पाठ करना चाहिए। इससे महापुण्य की प्राप्त होती है।
शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करता है और भगवत गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता है उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं। भगवत गीता में अठारह अध्याय हैं। इनमें ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को विश्वरूप के दर्शन का वर्णन किया गया है।
इस अध्याय में बताया गया है कि अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त देखा। श्री कृष्ण में ही अर्जुन ने भगवान शिव, ब्रह्मा एवं जीवन मृत्यु के चक्र को भी देखा। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अपने परब्रह्म रूप को व्यक्त करते हैं, जिसे देखकर अर्जुन का मोह भंग हो गया और वह युद्घ करने के लिए तैयार हो गए। इसलिए इस अध्याय का नियमित पाठ बड़ा ही उत्तम फलदायी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति नियमित गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता है, उसे भगवान विष्णु के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है।
ऐसे व्यक्ति की आत्मा मृत्यु के पश्चात परमात्मा के स्वरूप में विलीन हो जाती है अर्थात उन्हें मोक्ष मिल जाता है। गीता का अठारवां अध्याय मोक्ष संयास योग के नाम से जाना जाता है। जो व्यक्ति समय के अभाव में संपूर्ण गीता का पाठ नहीं कर पाता हैं वह केवल अठारवें अध्याय का पाठ करें तो उन्हें संपूर्ण गीता पाठ का लाभ मिल जाता है।