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कुतुप मुहूर्त में श्राद्ध क्यों माना जाता है शुभ? जानें पिंडदान और ब्राह्मण भोज से जुड़ी मान्यता

Thu, 08 Oct 2026 10:31 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: श्वेता सिंह Updated Thu, 08 Oct 2026 10:31 AM IST
सार

पितृ पक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के लिए कुतुप मुहूर्त को विशेष महत्व दिया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस समय पितरों के निमित्त किए गए कर्मकांड शुभ फलदायी माने जाते हैं। जानिए कुतुप मुहूर्त में श्राद्ध, पिंडदान और ब्राह्मण भोज करने के पीछे क्या मान्यता है।

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Kutup Muhurat for Shradh Know the Belief Behind Pind Daan and Brahmin Bhoj  in hindi
kutup muhurt - फोटो : amar ujala

पितृ पक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान पितरों की तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों का स्मरण और उनके प्रति सम्मान व्यक्त होता है। पितृ पक्ष में श्राद्ध के समय का भी विशेष महत्व बताया गया है। आमतौर पर पार्वण श्राद्ध के लिए कुतुप और रौहिण मुहूर्त को शुभ माना जाता है। यही वजह है कि कई स्थानों पर श्राद्ध कर्म, पिंडदान और इसके बाद ब्राह्मण भोज दोपहर के समय कराने की परंपरा देखने को मिलती है। आखिर कुतुप मुहूर्त को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना गया है, आइए जानते हैं।

 

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Kutup Muhurat for Shradh Know the Belief Behind Pind Daan and Brahmin Bhoj  in hindi
कुतुप मुहूर्त क्या होता है? - फोटो : freepik

कुतुप मुहूर्त क्या होता है?
कुतुप मुहूर्त दिन के उस विशेष समय को कहा जाता है, जिसे पितृ कर्मों के लिए शुभ माना गया है। इसका समय सूर्योदय, सूर्यास्त और स्थानीय दिनमान के आधार पर अलग-अलग हो सकता है। इसलिए कुतुप मुहूर्त का सटीक समय हर शहर में एक जैसा नहीं होता। पार्वण श्राद्ध में कुतुप और रौहिण मुहूर्त का विशेष उल्लेख मिलता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, श्राद्ध कर्म को उचित मुहूर्त में शुरू करके अपराह्न काल समाप्त होने से पहले पूरा करना शुभ माना जाता है। इसलिए किसी विशेष तिथि पर श्राद्ध करने से पहले स्थानीय पंचांग में दिए गए मुहूर्त को देखना बेहतर माना जाता है।

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दोपहर में ही श्राद्ध करने की परंपरा क्यों है? - फोटो : Amar Ujala

दोपहर में ही श्राद्ध करने की परंपरा क्यों है?
श्राद्ध के लिए दोपहर का समय निर्धारित होने के पीछे धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। हिंदू परंपरा में दिन के अलग-अलग समय को अलग प्रकार के धार्मिक कार्यों से जोड़ा गया है। सुबह का समय देव पूजा और दैनिक धार्मिक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि पितृ कर्मों के लिए दिन के मध्य का समय विशेष माना गया है। कुतुप मुहूर्त भी इसी अवधि के आसपास आता है। मान्यता है कि इस समय किया गया श्राद्ध पितरों को समर्पित कर्म के रूप में अधिक उपयुक्त होता है। इसी कारण पितृ पक्ष में श्राद्ध को सामान्य पूजा की तरह सुबह या शाम करने के बजाय निर्धारित पितृ मुहूर्त में करने की परंपरा है।

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सूर्य का पितृ कर्म से क्या संबंध है? - फोटो : AI

सूर्य का पितृ कर्म से क्या संबंध है?
पितृ कर्मों में सूर्य का भी धार्मिक महत्व बताया गया है। हिंदू ज्योतिष और धार्मिक परंपराओं में सूर्य को पितरों से संबंधित माना जाता है। दिन के मध्य में सूर्य अपने प्रभावशाली स्थान पर होता है, इसलिए इस समय को पितृ कर्मों के लिए विशेष मानने की परंपरा विकसित हुई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, सूर्य पितरों तक श्रद्धा और अर्पण पहुंचाने वाले माध्यम के रूप में भी देखे जाते हैं। यही वजह है कि पितृ पक्ष में तर्पण और श्राद्ध जैसे कर्मों के दौरान सूर्य की उपस्थिति और दिशा का ध्यान रखा जाता है। हालांकि, इन मान्यताओं का आधार धार्मिक परंपरा और शास्त्रीय विश्वास हैं। इन्हें वैज्ञानिक तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

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पिंडदान और तर्पण का क्या महत्व है? - फोटो : AI

पिंडदान और तर्पण का क्या महत्व है? 
श्राद्ध कर्म में पिंडदान और तर्पण को प्रमुख माना गया है। पिंडदान में पितरों के निमित्त अर्पण किया जाता है, जबकि तर्पण के दौरान जल अर्पित करके पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन कर्मों के माध्यम से व्यक्ति अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और सम्मान प्रकट करता है। पितृ पक्ष में अपनी क्षमता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार दान-पुण्य करने का भी विधान बताया गया है। श्राद्ध के बाद ब्राह्मण भोज क्यों कराया जाता है? श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद ब्राह्मण भोज कराने और दक्षिणा देने की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक विश्वास के अनुसार, ब्राह्मण को भोजन कराना और दान देना पितरों के निमित्त किए जाने वाले पुण्य कर्म का हिस्सा माना जाता है। कई परिवारों में श्राद्ध के दिन सात्विक भोजन तैयार करके पहले पितरों को समर्पित किया जाता है और उसके बाद ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराया जाता है। मान्यता है कि श्रद्धा से किया गया दान और भोजन पूर्वजों के प्रति सम्मान का प्रतीक हैं।

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