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Janmashtami 2020: इन सोलह कलाओं में निपुण थे भगवान श्रीकृष्ण

Thu, 06 Aug 2020 11:26 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला Published by: रुस्तम राणा Updated Thu, 06 Aug 2020 11:26 AM IST
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Janmashtami 2020 know these 16 kalayen of Lord Krishna
जन्माष्टमी 2020 - फोटो : Social media

जन्माष्टमी पर्व 12 अगस्त को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था। उनका जन्म द्वापर युग में भाद्रपद माह कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन रोहिणी नक्षत्र में हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण विष्णु जी के आठवें अवतार हैं। भागवत पुराण के अनुसार सोलह कलाओं में अवतार की पूरी सामर्थ्य खिल उठती है। अवतारों में श्रीकृष्ण में ही यह सभी कलाएं प्रकट हुई थी। इन कलाओं के नाम इस प्रकार हैं-

Janmashtami 2020 know these 16 kalayen of Lord Krishna
भगवान श्रीकृष्ण (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media

श्री-धन संपदा 
श्रीधन संपदा भगवान श्रीकृष्ण की पहली कला है। मुरली मनोहर धन संपदा से परिपूर्ण थे। जिस व्यक्ति के पास अपार धन हो और वह आत्मिक रूप से भी धनवान हो। जिसके घर से कोई भी खाली हाथ नहीं जाए वह प्रथम कला से संपन्न माना जाता है।

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भगवान श्रीकृष्ण (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media

भू-अचल संपत्ति
भगवान श्रीकृष्ण भू-अचल संपत्ति से संपन्न थे। यह उनकी दूसरी कला में आती है। जिस व्यक्ति के पास पृथ्वी का राज भोगने की क्षमता है। पृथ्वी के एक बड़े भू-भाग पर जिसका अधिकार है और उस क्षेत्र में रहने वाले जिसकी आज्ञाओं का सहर्ष पालन करते हैं वह अचल संपत्ति का मालिक होता है। भगवान श्री कृष्ण ने अपनी योग्यता से द्वारिका पुरी को बसाया था।

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lord krishna - फोटो : Social Media
कीर्ति- यश प्रसिद्धि

जिसके मान-सम्मान और यश की कीर्ति से चारों दिशाओं में गूंजती हो। लोग जिसके प्रति स्वतः ही श्रद्घा और विश्वास रखते हों वह तीसरी कला से संपन्न होता है। भगवान श्री कृष्ण में यह कला भी मौजूद है। लोग सहर्ष श्री कृष्ण की जयकार करते हैं।

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lord krishna - फोटो : pixabay

इला-वाणी की सम्मोहकता
चौथी कला का नाम इला है जिसका अर्थ है मोहक वाणी। भगवान श्री कृष्ण में यह कला भी मौजद है। पुराणों में श्री उल्लेख मिलता है कि श्री कृष्ण की वाणी सुनकर क्रोधी व्यक्ति भी अपना सुध-बुध खोकर शांत हो जाता था। मन में भक्ति की भावना भर उठती थी। यशोदा मैया के पास शिकायत करने वाली गोपियां भी कृष्ण की वाणी सुनकर शिकायत भूलकर तारीफ करने लगती थी।

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