प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष का षष्ठी तिथि को छठ पर्व मनाया जाता है। छठ केवल एक पर्व नहीं बल्कि आस्था का महापर्व है। छठ के पावन पर्व में आस्था का सैलाब सा उमड़ पड़ता है। हर ओर एक अलग ही उल्लास होता है। छठ व्रत में मुख्य रूप से सूर्य और छठी मईया का पूजन किया जाता है। यह व्रत परिवार में सुख-शांति, समृद्धि, संतान प्राप्ति व संतान की दीर्घायु की कामना के लिए किया जाता है। छठ का मुख्य पूजन और अर्घ्य षष्ठी तिथि को किया जाता है लेकिन इस पर्व का आरंभ कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय से हो जाता है। इसके अगले दिन खरना किया जाता है और फिर षष्ठी को छठ पर्व का मुख्य पूजन होता है। सप्तमी को पुनः उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रत पारण किया जाता है। तो चलिए जानते हैं चारों दिनों पर सूर्य को अर्घ्य देने का शुभ मुहूर्त, तिथि और नहाय-खाय व खरना विधि।
Chhath puja 2021: इस दिन है छठ पूजन, जानिए नहाय खाय, खरना विधि व छठ के दौरान हर दिन अर्घ्य देने का समय
छठ का आरंभ 08 नवंबर 2021 दिन सोमवार, नहाय-खाय से हो रहा है। 09 नवंबर 2021 दिन मंगलवार को खरना किया जाएगा और अस्ताचलगामी सूर्य को छठ का प्रथम अर्घ्य दिया जाएगा। 10 नवंबर 2021 दिन बुधवार को कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि पर छठ का मुख्य पूजन है। 11 नवंबर 2021 दिन बृहस्पतिवार को सप्तमी तिथि में उगते सूर्य को छठ का अंतिम अर्घ्य दिया जाएगा।
छठ पर्व में उगते और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा है। ये है सूर्योदय और सूर्यास्त का समय।
09 नवंबर सूर्यास्त- 17:29:59 छठ पर्व प्रथम अर्घ्य
10 नवंबर सूर्योदय- 06:40:29 छठ पर्व मुख्य अर्घ्य
10 नवंबर सूर्यास्त- 17:29:25 छठ पर्व संध्या अर्घ्य
11 नवंबर सूर्योदय- 06:41:15 छठ पर्व समापन अर्घ्य
राज्य और शहर के अनुसार समय में कुछ परिवर्तन हो सकता है।
यह छठ का प्रथम दिन होता है। इस दिन पूरे घर की अच्छे से साफ-सफाई की जाती है और स्नान के करने के पश्चात सूर्य को साक्षी मानकर व्रत का संकल्प लिया जाता है। इस दिन चने की सब्जी, चावल, साग का सेवन किया जाता है।
इस दिन पूरे दिन व्रत किया जाता है और छठ की तैयारियां होती हैं। शाम को नदी सरोवर पर कमर तक जाकर पानी में खड़े होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। मिट्टी के नए चूल्हे पर आम की लकड़ी से आग जलाकर साठी के चावल दूध और गुड़ से खीर बनाकर छठी मईया को अर्पित करने के बाद प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इसके बाद व्रती कुछ भी खाना-पीते नहीं हैं।