कैफी आजमी: कभी फूल तो कभी आग, 9 शानदार नगीने
'अजीब आदमी था वो, मुहब्बतों का गीत था, बगावतों का राग था, कभी वो सिर्फ फूल था, कभी वो सिर्फ आग था।' जावेद अख्तर ने कैफी आजमी को श्रद्धांजलि देने के लिए ये नज्म लिखी। उन्होने शुरू की कुछ लाइनों में ही कैफी को काफी समझा दिया। जावेद अख्तर ने ना सिर्फ उन्हें एक शायर के तौर पर जाना बल्कि एक परिवार के सदस्य के तौर पर भी जाना। जावेद उनके दामाद हैं, इसलिए वो उन्हें करीब से जानते थे। कैफी कुछ ऐसे ही थे कभी फूल कभी आग। आज हम कैफी आजमी की 97 वीं जयंती मना रहे हैं। उनके कुछ चुनिंदा शेरों के साथ उनकी जिंदगी पर एक नजर। (रिपोर्ट-रिज़वान/अमर उजाला,दिल्ली)
कैफी आजमी: कभी फूल तो कभी आग, 9 शानदार नगीने
कैफी आजमी 14 जनवरी 1919 को आजमगढ़ में पैदा हुए। नाम मिला सैयद अख्तर हुसैन रिजवी। लेकिन जाने गए कैफी आजमी के नाम से। उन्हें ये दुनिया छोड़े 13 साल हो गए। लेकिन उनका हर शेर ऐसा लगता है जैसे आज ही के लिए है। कैफी जवान होते हुए ही दो चीजों की तरफ सबसे पहले मुतास्सिर हुए। एक शायरी और दूसरा मार्क्सवाद। उनकी शुरूआती शायरी को लेकर तो काफी दिलचस्प किस्से हैं।
कैफी आजमी: कभी फूल तो कभी आग, 9 शानदार नगीने
कैफी ने सिर्फ 11 साल की उम्र में ही जब एक मुशायरे में अपनी गजल पढ़ी तो सब हक्के बक्के रह गए। मुशायरे के सदर ने भी उनकी तारीफ की। लेकिन क्योंकि उनके बड़े भाई भी शायरी करते थे। इसलिए ज्यादातर तो यही समझ बेठे कि बड़े भाई से लिखवा के लाया है। तो कैफी को छोटी सी उम्र में अपनी शायरी का इम्तहान देना पड़ा। ये परीक्षा खुद उनके पिता ने ली।
कैफी आजमी: कभी फूल तो कभी आग, 9 शानदार नगीने
खुद कैफी के पापा को लगता था कि शायद उन्होंने किसी की गजल चुरा ली है। इसलिए उन्होंने कैफी को एक मिसरा (शेर की एक लाइन) दिया। इस पर कैफी से गजल लिखने को कहा गया।
कैफी आजमी: कभी फूल तो कभी आग, 9 शानदार नगीने
कैफी ने पापा के दिए मिसरे पर गजल लिख के दी। कैफी के शानदार कलाम को देखते ही पिता समझ गए कि ये बड़ा शायर बनेगा। लेकिन उनकी जिंदगी में बड़ा मोड़ तब आया जब वो सिर्फ 24 साल की उम्र में ऐशो-आराम छोड़ कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सदस्य बन गए। सारी दुनिया को एक जैसा करने की ठान लेने वाले कैफी का इस तरफ जाना उनके परिवार की पृष्ठभूमि की वजह से भी चौंकाने वाला था।