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बीआरडी कांड: पूर्व प्रिंसिपल पर कोर्ट में हमला, 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा

Fri, 01 Sep 2017 01:09 AM IST
amarujala.com, Presented by: शारुख खान
amarujala.com, Presented by: शारुख खान Updated Fri, 01 Sep 2017 01:09 AM IST
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Doctor couple judicial custody for 14 days
डॉक्टर दंपित की कोर्ट में पेशी - फोटो : अमर उजाला
बीआरडी मामले में पूर्व प्रिंसिपल और उनकी पत्नी पर कोर्ट में पेशी के दौरान हमले की कोशिश की गई। लोगों ने पूर्व प्रिंसिपल से अभद्रता और गालीगलौज भी की। भारी पुलिस बल होने की वजह से लोग उनके पास नहीं पहुंच पाए। 

 
Doctor couple judicial custody for 14 days
डॉक्टर राजीव मिश्र - फोटो : अमर उजाला
बीआरडी मेडिकल कॉलेज प्रकरण में गिरफ्तार पूर्व प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्र और उनकी पत्नी डॉ. पूर्णिमा शुक्ला को एंटी करप्शन कोर्ट ने गुरुवार को 14 दिन की न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया। कोर्ट का आदेश सुनते ही डॉक्टर दंपती बदहवाश हो गए। पूर्व प्राचार्य के आंखों से आंसू निकल आए। डॉ. पूर्णिमा के चेहरे पर भी घबराहट देखने को मिली। 
 
Doctor couple judicial custody for 14 days
डॉ. पूर्णिमा शुक्ला - फोटो : अमर उजाला
कानपुर से गिरफ्तार पूर्व प्रिंसिपल और उनकी पत्नी को गुरुवार को पहले जिला चिकित्सालय ले जाया गया। चिकित्सकीय परीक्षण के बाद दोपहर एक बजे के करीब कड़ी सुरक्षा के बीच दोनों को एंटी करप्शन के इंचार्ज शिवानंद सिंह की कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने दलील सुनी और आरोपियों को जेल भेजने का आदेश पारित कर दिया। 
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Doctor couple judicial custody for 14 days
डॉ.डॉ. पूर्णिमा शुक्ला - फोटो : अमर उजाला
आरोपियों की पेशी के दौरान कचहरी परिसर छावनी में तब्दील हो गया था। एसपी ट्रैफिक आदित्य वर्मा और सीओ कैंट अभिषेक की मौजूदगी में सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए। सुरक्षा घेरे में लेकर ही आरोपियों को कोर्ट में पेश किया गया। करीब 30 मिनट की सुनवाई के बाद कोर्ट ने दोनों आरोपियों को जेलने का फैसला सुनाया। सुनवाई के दौरान डॉ. पूर्णिमा शुक्ला सिर झुकाए रहीं। फैसला सुनाने से पहले उन्होंने कोर्ट रूम में खुद को निर्दोष बताया। 
 
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डॉक्टर के अधिवक्ता का तर्क

Doctor couple judicial custody for 14 days
डॉ. पूर्णिमा शुक्ला - फोटो : अमर उजाला
एफआईआर देखने से कोई अपराध नहीं बन रहा है। किसी धारा को साबित करने का कोई सुबूत नहीं है। केवल मीडिया ट्रायल और शासन के दबाव में फर्जी बातें प्रथम सूचना रिपोर्ट में लिखी गई हैं। जो आरोप हैं, उसमें विभागीय जांच हो सकती है। यह सरकारी कर्मचारी सेवा नियमावली के तहत कदाचार हो सकता है। विभागीय दंड ही मिल सकते हैं। न्यायालय से दंडनीय अपराध नहीं हो सकता है। 
 
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