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Mahashivratri 2023: मनकामेश्वर के दर्शनों से ही पूरी हो जाती है मनोकामना, यहां पार्वती संग विराजे हैं महादेव

Fri, 17 Feb 2023 04:49 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सीहोर Published by: अंकिता विश्वकर्मा Updated Fri, 17 Feb 2023 04:49 PM IST
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Mahashivratri 2023 Famous Shiv temple of sehore, here nature consecrates Mahadev here is mother Parvati's home
टपकेश्वर महादेव मंदिर - फोटो : अमर उजाला
मध्यप्रदेश के सीहोर जिले में भगवान भोलेनाथ के कई ऐतिहासिक मंदिर हैं। जहां महाशिवरात्रि के दिन आप महादेव की पूजा अर्चना करने जा सकते हैं। आइए आपको जिले के प्रसिद्ध शिव मंदिरों की जानकारी देते हैं।


टपकेश्वर महादेव मंदिर
सीहोर जिले की बुदनी तहसील से करीब 25 किमी दूर स्थित टपकेश्वर महादेव मंदिर में जितनी ज़ोर से भगवान भोले का जयकारा लगाया जाता है, उतनी ही तेजी से गुफा में से शिवलिंग पर जल से अभिषेक होता है। यही वजह है कि यहां भगवान भोलेनाथ को टपकेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। सिर्फ श्रावण माह ही नहीं यहां बारह महीने प्रकृति भगवान शिव का अभिषेक करती है।

टपकेश्वर महादेव मंदिर बुदनी तहसील में आने वाले नकटीतलाई गांव से करीब छह किलोमीटर दूर विध्यांचल पर्वतों की पहाड़ियों के बीचों-बीच स्थित है। टपकेश्वर महादेव मंदिर जाने के लिए भक्तों को दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर जाना पड़ता है। बुदनी-संदलपुर नेशनल हाईवे-22 के सलकनपुर से कुछ दूरी पर दुर्गम पहाड़ी में एक चैतन्य महादेव की गुफा है। उसी जगह मंदिर स्थित है।

इसलिए खास है टपकेश्वर महादेव
जानकारों का कहना है कि यहां भयंकर गर्मी के दिनों में पहाड़ों से पानी रिसता रहता है। इस पानी से नित्य-निरंतर भगवान भोले का अभिषेक होता रहता है। टपकते हुए पानी से भगवान का अभिषेक होने के कारण इनका नाम टपकेश्वर महादेव पड़ गया। यहां साल के 12 महीने श्रद्धालु अभिषेक-पूजन करने आते हैं।

पहाड़ी पर पानी आना रहस्य
टपकेश्वर महादेव मंदिर में पानी का स्रोत कहां से आता है, यह बात आज तक रहस्य बनी हुई है। चट्टानों से बनी गुफा की विशेषता देखते ही बनती है। यहां पूजा-अर्चना तो पूरे वर्ष चलती है, लेकिन सावन मास और महाशिवरात्रि पर इसका महत्व और बढ़ जाता है।
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आष्टा के इस मंदिर में पार्वती संग विराजे हैं शिव - फोटो : अमर उजाला
यहां पार्वती संग विराजे हैं शिव
देवी पार्वती हिमालय पुत्री के नाम से जानी जाती हैं, लेकिन भोपाल के पास एक ऐसा स्थान है, जो पार्वती जी को अत्यंत प्रिय है और वे इसे अपना पीहर मानती हैं। कहा जाता है कि उनके पीहर में दामाद भोलेनाथ का मंदिर है लेकिन जो भी यहां श्रृद्धा से सिर झुकाता है उसे माता पार्वती जी के दर्शन भी हो जाते हैं।

जिला मुख्यालय से 45 किमी दूर आष्टा शहर अपने आप में एक अलग पहचान रखता है। इस नगर में भगवान भोलेनाथ और मां पार्वती के एक साथ दर्शन करने को मिल जाएंगे। यही कारण है कि आष्टा को मां पार्वती का पीहर भी कहा गया है। यहां दर्शन करने का सिलसिला लगातार चलता रहता है।
आष्टा शहर का प्राचीन शंकर मंदिर वर्षों पुराना होने के कारण आस्था का प्रतीक है। यह क्षेत्र मां पार्वंती का उद्गम स्थल भी है। खास बात ये है कि शंकर मंदिर से सटकर मां पार्वती निकली हैं। मंदिर में यदि कोई श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने आता है, तो उसे मां पार्वती के भी दर्शन करने को मिल जाते हैं। मंदिर के पुजारी हेमंत गिरी बताते हैं कि मंदिर वर्षों पुराना है। प्रदेश में ऐसा मंदिर देखने को नहीं मिलेगा, जहां से मां पार्वती निकली हों। मंदिर में वैसे तो 12 महीने श्रद्धालु आते रहते हैं, लेकिन महाशिवरात्रि त्यौहार और सावन माह में भीड़ में काफी इजाफा हो जाता है।  

पूरी होती है मन की मुराद 
मंदिर के पुजारी की माने तो जो श्रद्धालु सच्चे मन से मंदिर आता है, उसके मन की हर मुराद पूरी होती है। समिति और जनसहयोग से मंदिर का कायाकल्प होने के बाद एक बार आने वाला दोबारा आने की इच्छा रखता है।
Mahashivratri 2023 Famous Shiv temple of sehore, here nature consecrates Mahadev here is mother Parvati's home
सीहोर में स्थित सहस्त्रलिंगेश्वर मंदिर - फोटो : अमर उजाला
सहस्त्रलिंगेश्वर मंदिर
सीहोर के बढियाखेड़ी में सहस्त्रलिंगम महादेव का मंदिर करीब 300 साल से अधिक पुराना माना जाता है। मान्यता है कि मंदिर में जो शिवलिंग स्थापित है, वह सीवन नदी से निकला है। नदी से निकले इस स्वयंभू शिवलिंग के लिए नदी किनारे ही मंदिर का निर्माण कराया गया। इस शिवलिंग में एक हजार शिवलिंग समाहित है और यही कारण है कि इस शिवलिंग का नाम सहस्त्रलिंगम महादेव है। बताया जाता है कि सहस्त्रलिंगेश्वर जैसे पूरे देश में केवल तीन ही मंदिर हैं। इस मंदिर की प्रसिद्धि दूर-दूर तक है। मान्यता है कि शिवलिंग के दर्शन मात्र से सारी समस्याएं और कष्ट दूर हो जाते हैं। 

एक हजार शिवलिंग से हुआ है निर्माण
एक हजार छोटे-छोटे शिवलिंग से एक बड़ा शिवलिंग बना है। यही कारण है कि इस शिवलिंग का नाम सहस्त्रलिंगेश्वर है। इन छोटे शिवलिंग को बड़े शिवलिंग पर आसानी से देखा जा सकता है। पाषाण निर्मित ये शिवलिंग नदी की खुदाई से निकला है और इसकी पहचान कई साल पुरानी बताई जाती है। मंदिर में शिवलिंग की स्थापना के समय शिवलिंग को तांबे से सुसज्जित कर स्थापित किया गया है।

महाशिवरात्रि में होती है विशेष पूजा
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि अंग्रेजों के समय पास में ही सीवन नदी में खुदाई हो रही थी तभी यह शिवलिंग मिला। तब भी यह करीब 200 वर्षों से अधिक पुराना माना गया था। यहां शिवरात्रि और सावन में शिवलिंग के दर्शन के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं।

 
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पेशवाकालीन मनकामेश्वर मंदिर सीहोर - फोटो : अमर उजाला
पेशवाकालीन मनकामेश्वर मंदिर
सीहोर के तहसील चौराहे पर स्थित मनकामेश्वर मंदिर में आने वाले भक्त कभी निराश नहीं होते। यहां भोले बाबा कभी भी अपने भक्तों को निराश नहीं करते। मनकामेश्वर मंदिर में महादेव अपने भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी कर देते हैं। इसके साथ ही यहां बनी बावड़ी का भी अपना इतिहास है। सर्दी, गर्मी, बारिश पूरे साल इनमें समान तल पर पानी बना रहता है।

मनकामेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि में भक्तों का तांता लगता है। तहसील चौराहे के पास स्थित मनकामेश्वर मंदिर पेशवाकालीन है। इस मंदिर में भगवान के दर्शन मात्र से भक्तों के पाप खत्म हो जाते हैं और मन्नत पूरी जाती है। इस मंदिर की विशेषता है कि यहां बनी बावड़ी में हमेशा पानी रहता है। मनकामेश्वर मंदिर में श्रावण मास, महाशिवरात्रि में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। मनोहारी शिव मंदिर में वैसे तो सालभर भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन महाशिवरात्रि में मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के अलावा भव्य रूप से भोले का श्रृंगार किया जाता है। महाराष्ट्र की पुरातत्व वेत्ता लता अपलूचकर ने बीते वर्ष में सीहोर आने पर इस मंदिर के पेशवाकालीन होने की बात कही थी। इस बात का पिछले वर्षों में मनकामेश्वर मंदिर के जीर्णोद्वार में बावड़ी में लगे पत्थर निकलने पर तथ्य सामने आ चुका है। शहर के वरिष्ठ ओमदीप ने बताया कि मनकामेश्वर मंदिर की प्रतिमा नर्मदा स्टोन की बनी है। यह प्राचीन है, नंदेश्वर उसी समय के हैं। पूर्व में यहां भोलेनाथ की प्रतिमा ही थी। करीब दो सौ साल पुराने इस मंदिर के पास करीब तीन-चार दशक पहले तक जंगल जैसी स्थिति थी। 
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