कोरोनाकाल में जैसे ही घोषणा हुई कि इस खतरनाक वायरस से लोगों को बचाने के लिए देश के हित में लॉकडाउन का फैसला लिया जा रहा है, लोगों का जनजीवन अलग-अलग तरह से प्रभावित हुआ। लेकिन बहुत ही जल्दी यह स्पष्ट हो गया कि जिस तरह से इस निर्णय ने देश के मजदूर वर्ग को प्रभावित किया है, समाज का कोई भी अन्य वर्ग इतना संकट में नहीं था। मजदूर, रोज कमाने और खाने वाले लोग होते हैं उनके पास बचत का कोई विकल्प नहीं होता है, ऐसे में उनके लिए जीवनयापन करना आए दिन दुर्भर होता जा रहा था। अगली स्लाइड्स में जानिए कोरोनाकाल में लगे देशव्यापी लॉकडाउन ने किस तरह कर दिया था मजदूरों का जीवन तहस-नहस।
Year Ender 2020: जब कोरोना वायरस को चुनौती देने लाखों मजदूर दिल्ली के बस अड्डे पर हो गए थे इकट्ठा
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मजदूर हुए बेरोजगार
जैसे ही देश में लॉकडाउन की घोषणा हुई। सब जगह काम होना बंद गया। इमारतें अधबीच में रह गई, सरकारी कामों में ठहराव आ गया, वायरस के खौफ से मालिकों ने ड्राइवर, बावर्ची, माली आदि सभी को निकाल दिया। ऐसे में ये सभी लोग बेरोजगार हो गए। किसी मजदूर को कोई काम नहीं मिला। थोड़े ही दिनों में मजदूरों के घर राशन के लाले पड़ने लगे। छोटे-छोटे बच्चे भूख से तड़पने लगे।
लोगों की सहायता पर गुजारा जीवन
थोड़े दिन तो लोगों ने भी इन परिश्रम करने वाले साथियों की मदद करने का प्रयास किया। सरकार और संगठनों ने लॉकडाउन के बीच ही इन्हें राशन एवं भोजन पैकेट पहुंचाए लेकिन इस तरह से जीवन कब तक चलता। जिन मकान मालिकों के घर ये लोग किराये से रह रहे ते अब तो उनका भी जीवन मुश्किल हो रहा था। ऐसे में बिना किराया लिए इन्हें कैसे रहने दिया जा सकता था।
सामूहिक पलायन
फिर देश ने एक ऐसा दृश्य भी देखा जब लोगों के घरों से निकलने पर कड़ी सख्ती होने के बावजूद लाखों मजदूर दिल्ली के बस अड्डे पर जमा हो गए। बहुत सारे मजदूर साईकिल से, पैदल अपने घरों को गांव की ओर चल दिए। राजस्थान से महाराष्ट्र, दिल्ली से उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश से पंजाब देश के हर कोने से मजदूर अपने घर को निकले और गांव जाकर ही उन्होंने चैन की सांस ली।
शहरी लोग हुए परेशान
जब सारे मजदूर अपने घरों को चले गए तो शहरी लोगों पर विपत्ति छा गई। इसके पीछे वजह यह थी कि हम अपने छोटे- बड़े कामों के लिए अन्य लोगों पर इतने निर्भर हो गए हैं कि यदि कुछ भी बिगड़ जाता है तो हम फौरन परेशान हो जाते हैं। ऐसे में लोगों ने टूटे गेट को खुद से ठीक करने के प्रयास किए तो अधूरे काम को पूरा करने के लिए धीरज का भी सहारा लिया। इसी बहाने समाज ने ये जाना कि कोई इंसान छोटा- बड़ा नहीं होता है, जीवन में सबका अपना महत्व होता है।