हमारे आसपास जितने भी प्रकार के जीव-जंतु और पेड़-पौधे हैं, वे हमारी ही तरह इस धरती पर सदियों से रहते आए हैं, लेकिन बीती एक सदी में उनके क्षेत्र में हम इस कदर अतिक्रमण कर चुके हैं कि वे या तो खत्म हो चुके हैं, या खात्मे की कगार पर हैं। आज पृथ्वी दिवस पर दुनिया की सबसे बड़ी चिंता भी यही है। इसलिए इस बार की थीम रखी गई है- प्रजातियां संरक्षित कीजिए। इसलिए हम इस बार कुछ ऐसे जीवों और पेड़-पौधों से जुड़ी जानकारियां आप तक पहुंचा रहे हैं, जिनका देश में अस्तित्व हमारी वजह से नहीं रहा। इस रिपोर्ट में जानिए उनके खत्म होने की वजहों व परिस्थितियों के साथ मौजूदा हालातों का विश्लेषण।
World Earth Day 2019: लुप्त होते जीव जिनका हमारी वजह से नहीं रहा अस्तित्व
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ऐसे शुरू हुआ पृथ्वी दिवस
जनवरी 1969 में कैलिफोर्निया के सांताबारबरा स्थित समुद्र तट पर एक तेल के कुएं की खोदाई चल रही थी। इसी दौरान इसमें विस्फोट हो गया। इससे करोड़ों गैलन कच्चा और हानिकारक तेल समुद्र में फैल गया, जिसने लाखों पक्षियों, डॉल्फिन, सील, सी-लॉयन, मछलियों की जान ले ली। इस घटना ने दुनिया को मनुष्य द्वारा पैदा किए गए उन खतरों के बारे में बताया जो इस पृथ्वी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसी वर्ष यूनेस्को में एक कॉन्फ्रेंस हुई और पर्यावरणविदों ने पृथ्वी के सम्मान, शांति और यहां मौजूद जीवन को बनाए रखने के लिए एक दिन समर्पित करने का निवेदन किया। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र संघ ने 22 अप्रैल 1970 को पहला पृथ्वी दिवस मनाने की परंपरा शुरू की।
इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (आईयूसीएन) खत्म हो रहे जीव-जंतुओं की सूची तैयार करता है। इसमें जीवों की संख्या और संरक्षण की स्थिति के अनुसार लुप्त, अस्तित्व खतरे में जैसे तीन वर्गीकरण किए गए हैं। इस सूची में भारत के जीवों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है।
वर्ष - आईयूसीएन लिस्ट में भारत के जीव
2009 - 413
2014 - 646
2018 - 683
चीता
रफ्तार की बात हो तो उदाहरण चीता का दिया जाता है, मगर यह बड़ा दुर्भाग्य है कि जिस चीता को नाम हमने दिया, वह अब हमारेदेश में ही नहीं है। चीता नाम संस्कृत शब्द चित्रय से आया। इसके मायने हैं सजावट किया गया या चित्रित। शरीर पर मौजूद काली चित्तियों से हम भारतीयों ने उसे चीता नाम दिया। भारत में इसकी एशियाई प्रजाति राजस्थान (पहले राजपूताना), गुजरात, पंजाब से लेकर बंगाल और कश्मीर से लेकर दक्षिण में डेक्कन के पठारों में रहती थी। लेकिन, शासकों व सामंतों के शिकार के शौक ने देश में चीते की आबादी को तेजी से खत्म किया। कई शासकों ने तो इन्हें जंगलों से पकड़कर साथ रखना भी शुरू कर दिया। 1947 में आजादी मिली और 1948 में मध्यभारत की सरगुजा (छत्तीसगढ़ की पूर्व रियासत) के शासक रामानुज प्रताप सिंहने आखिरी तीन चीतों को शिकार के लिए गोली से उड़ा दिया। इसके बाद से भारत के जंगलों में चीता कभी नहीं देखा गया। इन्हीं रामानुज के नाम ही 1710 बांघों के शिकार का शर्मनाक रिकॉर्ड भी है।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के 1947-48 में प्रकाशित जर्नल में दर्ज वाक्ये के अनुसार इन तीनों चीतों को मारने के लिए जंगल में पूरी रात छानबीन करवाई गई। भारी आवाज के यंत्र और शक्तिशाली स्पॉटलाइटों का उपयोग किया गया। सोसाइटी ने इसे कानूनी तौर पर सजा के योग्य करार दिया। चीता एक शर्मीला जीव था, जो कभी मनुष्यों पर हमला नहीं करता था। जर्नल के सभी संपादक इस सूचना और रामानुज के कृत्य से इतने दुखी हुए कि इस घटना को दर्ज भी नहीं करना चाहते थे। उन्हाेंने लिखा कि वे इसे रामानुज के कार्य की भर्त्सना के रूप में दर्ज कर रहे हैं।
आज की स्थिति
दुनिया में आज केवल 60 एशियाई चीते बचे हैं। वे सभी ईरान में हैं, जहां उनका अस्तित्व भी संकट में है। उपद्रव और हिंसक गतिविधियों के चलते उन्हें लगातार मारा जा रहा है। ईरान ने 10 चीतों के बंदी दशाओं में प्रजनन के लिए संरक्षण प्रोजेक्ट शुरू किया है। लेकिन, यह बहुत छोटे स्तर पर है और इसकी सफलता अभी निश्चित नहीं है। भारत में आज यह केवल कुछ तस्वीरों, खत्म हो चुकी रियासतों के राजचिह्नों और पेंटिंग्स में बचे हैं।
करीब 100 वर्ष पूर्व तक भारत के पूर्वोत्तरी हिस्से, भूटान, आज के बांग्लादेश और म्यांमार में सुमात्राई गैंडा राज करता था। आकार में यह सबसे छोटो गैंडा माना जाता है, लेकिन इसका भी तेजी से शिकार किया गया। चीन और दक्षिण-पूर्वी देशों में इसके मांस, अंग व खाल की मांग ने शिकार को कभी रुकने नहीं दिया। दूसरी ओर, म्यांमार में अशांत इलाकों की वजह से इनकी सुरक्षा पर खतरा बना रहा। इनके जंगलों को भी तेजी से नष्ट किया गया। भारत के असम, नागालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम, उत्तर बंगाल आदि हिस्सों में ये गैंडे धीरे-धीरे विलुप्त होते गए। भारतीय उपमहाद्वीप में आखिरी बार सुमात्राई गैंडा 1967 में चिटगांव के कोक्स बाजार क्षेत्र में नजर आया था, लेकिन शिकारियों ने उसे भी मार डाला। बाद में असम, नागालैंड और मणिपुर सहित म्यांमार सीमा पर यदाकदा इसके दिखने की अपुष्ट सूचनाएं दर्ज की गईं, लेकिन क्षेत्रीय विद्रोहियों की वजह से यहां विस्तृत शोध कर पाना संभव नहीं रहा।
आज की स्थिति
केवल 100 सुमात्राई गैंडे बचे हैं। इनमें से अधिकतर इंडोनेशिया के सुमात्रा, बोर्नियो, मलेशिया, व आसपास के देशों में होने का अनुमान है, लेकिन भारत में अब यह नहीं बचे।