कर्बला का युद्ध केवल मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि हिंदुओं के एक खास ब्राह्मण वर्ग के लिए भी बहुत मायने रखता है। बहुत कम लोग ही जानते हैं कि दक्षिण एशिया, खासकर भारत में एक ऐसा हिंदू समुदाय भी रहता है जिसका इमाम हुसैन की लड़ाई से जुड़ाव रहा है। यह समुदाय हुसैनी ब्राह्मण के तौर पर जाना जाता है।
कहानी उस हिंदू राजा की जिसने इमाम हुसैन के लिए अपने बेटों की कुर्बानी दे दी
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कौन हैं हुसैनी ब्राह्मण ?
हुसैनी ब्राह्मण मोहयाल समुदाय के वो लोग हैं जो हिंदू और मुसलमान दोनों से संबंध रखते हैं। वर्तमान समय में यह हुसैनी ब्राह्मण सिंध, पाकिस्तान और अरब के अलावा पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, दिल्ली और भारत के अन्य हिस्सों में रहते हैं। हिस्ट्री ऑफ मुहियाल्स नाम की किताब के मुताबिक, कर्बला के युद्ध के समय 1400 ब्राह्मण उस समय बगदाद में रहते थे।
कर्बला की जंग
इराक की राजधानी बगदाद से 120 किलोमीटर दूर कर्बला एक शहर है। मक्का-मदीना के बाद कर्बला इस्लाम धर्म के लोगों के लिए एक प्रमुख स्थान है। मान्यताओं के अनुसार जब क्रूर बादशाह यजीद ने खुद को इस्लाम धर्म का शहंशाह घोषित किया तो पैगंबर मुहम्मद साहब के नवासे 'हजरत इमाम हुसैन' और उनके अनुयायियों ने मानने से साफ इनकार कर दिया।
बादशाह यजीद इस बात को समझ गया था कि हुसैन के जिंदा रहते वह कभी भी शहंशाह नही बन सकता है। इसी वजह से यजीद ने इमाम हुसैन को एक खत लिख जंग का एलान कर दिया। क्रूर शहंशाह बने यजीद को चुनौती देने के लिए इमाम हुसैन इराक वासियों के भरोसे मक्का से अपने परिवार के साथ इराक के लिए निकल पड़े। यजीद की फौज ने धोखे से हुसैन के समर्थकों को इराक में रोक लिया और कर्बला के मैदान में दलजा नदी के किनारे हुसैन के काफिले को भी रोक दिया।
संकट आने पर लोग अपनों को जरूर याद करते हैं। ठीक उसी तरह इमाम हुसैन ने भी इस संकट की घड़ी में मदद के लिए दो खत लिखे। इमाम हुसैन का लिखा एक खत भारत भी पहुंचा। यह खत भारत में हुसैनी ब्राह्मणों के राजा राहिब सिद्धदत्त के लिए लिखा गया था।