रूपाश्री शर्मा
दखलअंदाजी किसी को भी पसंद नहीं होती, खासकर रिश्तेदारों की, मगर खुलकर मना भी नहीं किया जा सकता। ऐसे में इस स्थिति से निपटने के लिए आपको कुछ तरीके अपनाने होंगे। रिश्तेदारों का हस्तक्षेप कई बार आपके लिए परेशानी बन जाता है, लेकिन आप कुछ गलत या दिल को बुरा लगने जैसा कहना भी नहीं चाहतीं, क्योंकि रिश्ते खराब होने का डर रहता है। ऐसे में, आपको कुछ सीमाएं तय करनी होंगी, ताकि आप रिश्तों की मिठास को बनाए रख सकें। लेकिन जरूरी है कि आप इसे समझदारी से हैंडल करें।
कुछ सीमाएं
साफ बोलो, सुखी रहो! यह बात हमेशा से बुजुर्ग बोलते आए हैं, जो कि काफी हद तक सही भी है। इसलिए अपने रिश्तेदारों को यह स्पष्ट रूप से बताएं कि आप किस तरह का व्यवहार स्वीकार करती हैं और किस तरह का नहीं। आप अपनी इन सीमाओं को दृढ़ता से और स्पष्ट रूप से बताएं। यदि वे आप की सीमाओं का सम्मान नहीं करते हैं तो उन्हें इसका अहसास कराएं, जैसे कि उनसे मिलना कम कर दें या फिर निजी जानकारी उन से साझा न करें।
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गुस्सा नहीं, शांति
जब रिश्तेदार आपकी जिंदगी में सीमा से ज्यादा दखल दें तो आप गुस्से से नहीं, शांति से काम लें। गुस्सा या चिड़चिड़ापन महसूस करना स्वाभाविक है, लेकिन ऐसा करने से स्थिति और खराब हो सकती है। इसलिए गहरी सांस लें और शांत रहने का प्रयास करें।
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उनका नजरिया
यह समझने की कोशिश करें कि आपके रिश्तेदार ऐसा व्यवहार क्यों कर रहे हैं। हो सकता है कि वे आपको लेकर चिंतित हों या मदद करने की कोशिश कर रहे हों। हालांकि यह भी हो सकता है कि वे गलत सोच से ऐसा कर रहे हों। लेकिन आप उनकी भावनाओं को स्वीकार करें, भले ही आप उनके कार्यों से सहमत न हों।
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दिल पर न लें
जब आप जानती हैं कि आपके कुछ रिश्तेदारों का स्वभाव हर बात या काम में दखल या अपनी राय देना है तो आप बड़ा दिल रखें और उनकी बातों को दिल पर न लें। उनकी बातों को एक कान से सुनें और दूसरे से निकाल दें। आप वही काम करें, जो आप करना चाहती हैं। ऐसा करने पर उन्हें साफ पता चल जाएगा कि आपको उनका स्वभाव ठीक नहीं लगा।
एक निश्चित दूरी
अगर कोई रिश्तेदार आपकी चीजों में तब भी दखल देता है, जब कोई समस्या या सलाह की मांग नहीं होती तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आपको अपने रिश्ते के बारे में उनसे बिल्कुल भी जानकारी साझा नहीं करनी चाहिए। अगर कोई रिश्तेदार आपकी पूरी कोशिशों के बावजूद अनचाही सलाह देने के लिए तैयार रहता है तो समझदारी यही होगी कि आप उसके पास तभी जाएं, जब आपको किसी खास बात पर उसकी राय चाहिए हो, अन्यथा उससे दूरी रखें।
दिल का कहा माने
वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक डॉ. एस. धनंजय कहते हैं, जिंदगी में रिश्ते और रिश्तेदार, दोनों का ही अपना महत्व है, लेकिन यदि कोई रिश्तेदार मांगे बिना ही राय देता है तो उसे सुनने में कोई बुराई नहीं है। उसे मानना या न मानना अपने विवेक पर निर्भर करता है। ऐसी एक कहावत है कि सुनो सबकी और करो अपनी। इसलिए कोई भी निर्णय अपने विवेक से लें। वहीं, अगर दखलअंदाजी से आप परेशान हो रही हैं तो रिश्तेदार को खुलकर बता दें कि उसकी राय भले ही कुछ भी हो, लेकिन आप इस मुद्दे पर क्या सोचती हैं। आप उससे साफ कह दें कि जब आप मेरे फैसलों पर सवाल उठाते हैं तो मुझे निराशा महसूस होती है। इससे उसे यह समझने में मदद मिलेगी कि उसके शब्दों और कार्यों का आप पर क्या प्रभाव पड़ता है।