Hanuman Janmotsav 2025 : महाबलशाली और बल-बुद्धि हनुमान जी का जन्मोत्सव 12 अप्रैल 2025 को मनाया जा रहा है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पूर्णिमा को हनुमान जी का जन्म हुआ था। हनुमान जी को 'अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता' कहा जाता है। हनुमान चालीसा की एक चौपाई में यह प्रसंग मिलता है, जिसके मुताबिक माता सीता ने हनुमान जी को आठ सिद्धियों और नौ निधियों को प्राप्त करने का वरदान दिया था।
Hanuman Janmotsav 2025: हनुमान जी के पांच गुण अपना लिए तो सफलता चूमेगी कदम
जीवन को सरल बनाया जा सकता है और सफलता की राह में आने वाली बाधाओं को निडरता से पार किया जा सकता है। हनुमान जन्मोत्सव के मौके पर बजरंगबली के गुणों के बारे जानिए, जिन्हें अपनाकर आपका जीवन सफल बन सकता है।
लक्ष्य प्राप्ति तक आराम नहीं
अंजनीसुत के व्यक्तित्व में लक्ष्य की प्राप्ति के लिए एकाग्रता और हठ का गुण था। जब तक वह लक्ष्य प्राप्त कर नहीं लेते थे, तब तक आराम नहीं करते थे। ऐसा उन्होंने माता सीता को खोजने के दौरान किया और मार्ग में विश्राम तक नहीं किया। लक्ष्य प्राप्ति के लिए वह निरंतर परिश्रम और प्रयास करते रहे। उनका ये गुण अपना लिया तो आप भी अपने लक्ष्य को प्राप्त करके ही रहेंगे।
संवाद कौशल
हनुमान जी का एक गुण था, उनका संवाद कुशल होना। उनका संवाद कौशल असाधारण था। अशोक वाटिका में माता सीता से पहली मुलाकात पर उन्होंने अपने कुशल संवाद से माता को भरोसा दिलाया कि वह श्रीराम के भेजे दूत हैं। उनका संवाद कौशल लंका नरेश के दरबार में रावण के समक्ष भी दिखा। संवाद कौशल से आपका आधा काम आसान हो सकता है। सफलता के लिए अच्छा संवाद होना बेहद जरूरी है।
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बल और बुद्धि का तालमेल
बजरंगबली बल और बुद्धि दोनों के बेहतरीन संतुलन का प्रतीक हैं। सबसे बलशाली होते हुए भी उन्होंने जहां जरूरत हुई वहां शक्ति प्रदर्शन की बजाए बुद्धि का उपयोग किया। सीता माता की खोज के लिए जब वह समुद्र पार कर रहे थे तो मार्ग में सुरसा राक्षसी मिलीं, इसका सामना हनुमान जी बल से कर सकते थे ,लेकिन उन्होंने बुद्धि से काम लिया। वहीं लंकिनी ने जब लंका में प्रवेश करने से हनुमान जी को रोका तो हनुमान जी ने बुद्धि के बल पर उन्हें भी हराया।
जिज्ञासु
हनुमान जी बचपन से ही जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे। आसमान में चमकते सूरज को देख उनकी जिज्ञासा बढ़ी और वह सूर्य देव तक पहुंच गए। देवताओं ने उन्हें मार्ग में रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन अपनी जिज्ञासा की पूर्ति के लिए वह गतिमान और तेज लालिमा वाले सूर्य के समक्ष आ गए। बाद में ज्ञान की प्राप्ति के लिए उन्होंने सूर्यदेव को अपना गुरु भी बनाया। सूर्य देव के रथ के साथ उसी गति में उड़ते हुए हनुमान जी ने उन से शिक्षा प्राप्त की।