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क्या ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया बिगाड़ रहा है मानसिक सेहत? जानें डिजिटल स्ट्रेस के संकेत
Thu, 08 Oct 2026 11:07 AM IST
Shruti Gaur
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Shruti Gaur
Updated Thu, 08 Oct 2026 11:07 AM IST
सार
World Mental Health Day: इस लेख में जानें कि ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया का इस्तेमाल मानसिक सेहत को कैसे प्रभावित कर सकता है, डिजिटल स्ट्रेस के कौन-कौन से संकेत नजर आते हैं और इससे बचने के लिए क्या उपाय अपनाने चाहिए।
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क्या ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया मानसिक सेहत बिगाड़ रहा है?
- फोटो : AI
World Mental Health Day: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई, नौकरी, मनोरंजन से लेकर दोस्तों और परिवार से जुड़े रहने तक, ज्यादातर काम स्क्रीन के जरिए होने लगे हैं। लेकिन लगातार नोटिफिकेशन देखना, सोशल मीडिया पर घंटों स्क्रॉल करना और दूसरों की जिंदगी से अपनी तुलना करना मानसिक सेहत पर असर डाल सकता है।
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क्या ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया मानसिक सेहत बिगाड़ रहा है?
- फोटो : AI
डिजिटल स्ट्रेस के संकेत
लगातार मोबाइल चेक करने की इच्छा डिजिटल स्ट्रेस का एक संकेत हो सकती है। अगर फोन पास न होने पर बेचैनी महसूस हो या बार-बार बिना किसी खास वजह के स्क्रीन देखने की आदत बन जाए, तो स्क्रीन टाइम पर ध्यान देना जरूरी है।
सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के बाद तनाव, उदासी या अपनी जिंदगी को दूसरों से कमतर समझना भी एक चेतावनी हो सकती है। सोशल मीडिया पर लोग अक्सर अपनी जिंदगी के चुनिंदा अच्छे हिस्से ही दिखाते हैं, जिससे तुलना की भावना बढ़ सकती है।
नींद का प्रभावित होना भी महत्वपूर्ण संकेत है। देर रात तक मोबाइल चलाना या सोने से ठीक पहले सोशल मीडिया देखना नींद की दिनचर्या को बिगाड़ सकता है। इसके अलावा ध्यान लगाने में परेशानी, काम में मन न लगना, चिड़चिड़ापन और लगातार मानसिक थकान भी ज्यादा डिजिटल इस्तेमाल से जुड़ी हो सकती है।
लगातार मोबाइल चेक करने की इच्छा डिजिटल स्ट्रेस का एक संकेत हो सकती है। अगर फोन पास न होने पर बेचैनी महसूस हो या बार-बार बिना किसी खास वजह के स्क्रीन देखने की आदत बन जाए, तो स्क्रीन टाइम पर ध्यान देना जरूरी है।
सोशल मीडिया इस्तेमाल करने के बाद तनाव, उदासी या अपनी जिंदगी को दूसरों से कमतर समझना भी एक चेतावनी हो सकती है। सोशल मीडिया पर लोग अक्सर अपनी जिंदगी के चुनिंदा अच्छे हिस्से ही दिखाते हैं, जिससे तुलना की भावना बढ़ सकती है।
नींद का प्रभावित होना भी महत्वपूर्ण संकेत है। देर रात तक मोबाइल चलाना या सोने से ठीक पहले सोशल मीडिया देखना नींद की दिनचर्या को बिगाड़ सकता है। इसके अलावा ध्यान लगाने में परेशानी, काम में मन न लगना, चिड़चिड़ापन और लगातार मानसिक थकान भी ज्यादा डिजिटल इस्तेमाल से जुड़ी हो सकती है।
क्या ज्यादा मोबाइल और सोशल मीडिया मानसिक सेहत बिगाड़ रहा है?
- फोटो : AI
डिजिटल स्ट्रेस से कैसे बचें?
सबसे पहले अपने स्क्रीन टाइम पर नजर रखें। गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करना और सोशल मीडिया के लिए रोजाना एक निश्चित समय तय करना मददगार हो सकता है।
सोने से कम से कम 30-60 मिनट पहले मोबाइल और दूसरे स्क्रीन डिवाइस से दूरी बनाने की कोशिश करें। दिन में कुछ समय बिना फोन के बिताएं और इस दौरान टहलना, एक्सरसाइज, किताब पढ़ना या परिवार के साथ समय बिताना बेहतर विकल्प हो सकता है।
सोशल मीडिया पर दिखने वाली जिंदगी को वास्तविक जिंदगी से तुलना करने से बचें। अगर लगातार तनाव, बेचैनी, उदासी या नींद की समस्या बनी रहती है और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
सबसे पहले अपने स्क्रीन टाइम पर नजर रखें। गैरजरूरी नोटिफिकेशन बंद करना और सोशल मीडिया के लिए रोजाना एक निश्चित समय तय करना मददगार हो सकता है।
सोने से कम से कम 30-60 मिनट पहले मोबाइल और दूसरे स्क्रीन डिवाइस से दूरी बनाने की कोशिश करें। दिन में कुछ समय बिना फोन के बिताएं और इस दौरान टहलना, एक्सरसाइज, किताब पढ़ना या परिवार के साथ समय बिताना बेहतर विकल्प हो सकता है।
सोशल मीडिया पर दिखने वाली जिंदगी को वास्तविक जिंदगी से तुलना करने से बचें। अगर लगातार तनाव, बेचैनी, उदासी या नींद की समस्या बनी रहती है और रोजमर्रा के काम प्रभावित होने लगते हैं, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।