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नई तकनीक: एयरबोर्न बीमारियों को कम करने की दिशा में बड़ा कदम, जानिए इस बारे में सबकुछ विस्तार से

Sat, 14 Aug 2021 06:23 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Sat, 14 Aug 2021 06:23 PM IST
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Researchers will develop air sanitisation to contain airborne diseases, all you need to know
एयरबोर्न बीमारियों का खतरा होगा कम (सांकेतिक) - फोटो : Pixabay

हवा में अशुद्धि और वातावरणीय प्रदूषण कई तरह की गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का कारण बन सकती है। महामारी के इस दौर में कई अध्ययनों में कोरोना वायरस के भी हवा के माध्यम से भी प्रसारित होने का दावा किया गया था। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना का संक्रमण उन स्थानों पर अधिक हो सकता है जहां पर अच्छे वेंटिलेशन की कमी है। इसके अलावा कॉमन कोल्ड, चेचक और टीबी जैसी बीमारियों को भी एयरबोर्न माना जाता है। मतलब, हवा की अशुद्धियों को कम करके कई तरह की गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रहा जा सकता है। इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए देश के कुछ संस्थानों ने मिलकर वायु स्वच्छता प्रणाली विकसित करने की दिशा में काम करने की शुरुआत की है।


रिपोर्टस के मुताबिक आईआईटी मद्रास, वेल्लोर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी चेन्नई और लंदन की क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने कोरोनोवायरस और टीबी के संक्रमण को रोकने के लिए वायु स्वच्छता प्रणाली विकसित करने के लिए हाथ मिलाया है। यूके का रॉयल एकेडमी ऑफ इंजीनियरिंग (आरएईएनजी) इस परियोजना का मुख्य प्रायोजक होगा। आइए जानते हैं कि वैज्ञानिक जिस प्रणाली को विकसित करने की दिशा में काम करने जा रहे हैं, वह आज के समय में क्यों आवश्यक है?

Researchers will develop air sanitisation to contain airborne diseases, all you need to know
कोरोना जैसे संक्रमण का खतरा होगा कम - फोटो : iStock

इनडोर वायुजनित रोगों को कम करने का लक्ष्य
परियोजना के बारे में शीर्ष शैक्षणिक संस्थानों के अधिकारियों का कहना है कि इस संयुक्त शोध का उद्देश्य इनडोर वातावरण में वायुजनित रोगों को रोकने के लिए जैव-एयरोसोल सुरक्षा प्रणाली विकसित करना है। अधिकारियों का कहना है कि इस परियोजना की परिकल्पना अल्ट्रावायलेट-सी रेडिएशन को नियोजित करते हुए एयर फिल्टर सिस्टम को विकसित करने की है। इस प्रणाली में वायरस और अन्य वायुजनित रोगजनकों को खत्म करने की प्रभावशीलता होगी। इतना ही नहीं मौजूदा समय में देश में उपलब्ध एयर फिल्टर उपकरणों की तुलना में इसका रखरखाव और लागत भी कम होगा।

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हवा की स्वच्छता के लिए तकनीक पर काम (सांकेतिक) - फोटो : Pixabay

स्वास्थ्य क्षेत्र में साबित होगी बड़ी कामयाबी
परियोजना के बारे में आईआईटी मद्रास के प्रोफेसर अब्दुस समद बताते हैं, भारत में वैसे तो पहले से ही कई तरह के यूवीसी समाधान बाजार में मौजूद हैं, लेकिन उनमें उचित वायुजनित कीटाणुशोधन करने के लिए आवश्यक तकनीकी की कमी है। इसके चलते उपभोक्ताओं में भ्रम और अविश्वास पैदा हो रहा है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए इस परियोजनाओं का लक्ष्य एक ऐसा समाधान विकसित करना है जो व्यापक रूप से परीक्षण के आधार पर तैयार किया गया हो। उम्मीद है कि इस परियोजना के सफलतापूर्वक लागू होने पर भारतीय उपमहाद्वीप में लगभग 10 करोड़ लोगों को लाभ होगा।

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हवा की स्वच्छता के लिए परियोजना पर काम - फोटो : Pixabay

एयरबोर्न बीमारियों का खतरा होगा कम
क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के प्रोफेसर एल्डाड अविटल कहते हैं, दुनियाभर में इस समय कोरोना की महामारी फैली हुई। वायरस के नए वैरिएंट्स लगातार चिंता का कारण बने हुए हैं। हमें इसे नियंत्रित करने के लिए व्यापक रूप से सभी स्थानों को कीटाणुरहित करने के लिए सही तकनीक के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। जिस परियोजना को लेकर हम काम शुरू कर रहे हैं उसमें इनडोर परिस्थितियों के लिए वायु कीटाणुनाशकों को खत्म करने की दिशा में विशेष ध्यान दिया जाएगा, जिससे भविष्य में एयरबोर्न बीमारियों के खतरे को कम किया जा सके। 


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नोट: यह लेख  मीडिया रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 

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