पिछले दो-तीन दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि कई प्रकार के संक्रामक रोग और क्रोनिक बीमारियों ने वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा की हैं। विशेषज्ञों ने इसी तरह की एक और तेजी से बढ़ती गंभीर स्वास्थ्य चुनौती को लेकर अलर्ट किया है- वह है एंटीबायोटिक प्रतिरोध या रेजिस्टेंस।
चेतावनी: सिर्फ एंटीबायोटिक्स ही नहीं, दर्द-बुखार की दवाओं से भी बढ़ रहा है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा
- अब तक माना जाता था कि केवल ज्यादा एंटीबायोटिक लेने से ही एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस विकसित होता है, लेकिन नवीनतम शोध में नई जानकारी सामने आई है।
- यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों ने पाया है कि आम तौर पर दर्द और बुखार में दी जाने वाली पैरासिटामोल और आइबुप्रोफेन जैसी दवाएं भी बैक्टीरिया को एंटीबायोटिक्स के खिलाफ मजबूत बना रही हैं।
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दर्द और बुखार की दवाएं भी बढ़ा रही हैं खतरा
एनपीजे जर्नल एंटीमाइक्रोबियल्स एंड रेसिस्टेन्स में प्रकाशित शोध में खुलासा हुआ है कि जब पैरासिटामोल और आइबुप्रोफेन को आम एंटीबायोटिक सिप्रोफ्लॉक्सासिन और ई-कोलाई बैक्टीरिया (जो आंत और यूरीन संक्रमण का प्रमुख कारण है) के संपर्क में लाया गया तो बैक्टीरिया ने तेजी से जीन संबंधी बदलाव कर लिए। इससे वे न केवल सिप्रोफ्लॉक्सासिन बल्कि कई अन्य एंटीबायोटिक्स के प्रति भी प्रतिरोधी हो गए।
दवाओं के इस अप्रत्याशित प्रभाव से बैक्टीरिया अपनी रक्षा प्रणाली को सक्रिय कर लेते हैं, एंटीबायोटिक्स को बाहर निकाल देते हैं और संक्रमण का इलाज कठिन हो जाता है।
गैर-एंटीबायोटिक दवाओं से भी खतरा
शोधकर्ताओं का कहना है कि जब इन दवाओं को साथ में दिया जाता है तो यह खतरा और भी बढ़ जाता है।
वैज्ञानिकों ने नौ गैर-एंटीबायोटिक दवाओं का अध्ययन किया। इनमें दर्द और सूजन के लिए आइबुप्रोफेन और डाइक्लोफेनाक, बुखार व दर्द के लिए पैरासिटामोल, हाई ब्लड प्रेशर के लिए फ्यूरोसेमाइड, डायबिटीज के लिए मेटफॉर्मिन, कोलेस्ट्रॉल के लिए एटोरवास्टेटिन, सर्जरी के बाद के दर्द के लिए ट्रामाडोल, नींद की समस्या के लिए टेमाजेपैम और बंद नाक के लिए स्यूडोएफेड्रिन को शामिल किया गया।
भारत में बढ़ता जा रहा है खतरा
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का भारत हॉटस्पॉट माना जाता है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित आंकड़ों के अनुसार देश में 70 प्रतिशत से अधिक मरीजों को एंटीबायोटिक्स बिना परीक्षण के दी जाती हैं।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि ई-कोलाई और क्लेब्सिएला जैसे बैक्टीरिया भारत में कई सामान्य एंटीबायोटिक्स के प्रति पहले से ही 50 से 60 प्रतिशत तक प्रतिरोधी हो चुके हैं।
विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि दवाओं के इस अनियंत्रित इस्तेमाल पर रोक नहीं लगी तो आने वाले वर्षों में भारत एएमआर से सबसे अधिक प्रभावित देशों में होगा।
दुनियाभर में बढ़ रही है रोगाणुरोधी प्रतिरोध की समस्या
लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में रोगाणुरोधी प्रतिरोध के कारण दुनियाभर में सीधे तौर पर 12.7 लाख लोगों की मौत हुई, जबकि कुल 49.5 लाख मौतों में एएमआर ने परोक्ष रूप से अहम भूमिका निभाई। इसका अर्थ यह है कि एक ओर जहां लाखों लोगों की जान केवल इसलिए गई क्योंकि एंटीबायोटिक दवाएं काम नहीं कर पाईं, वहीं दूसरी ओर कई मरीज अन्य बीमारियों से तो मरे, लेकिन उनकी हालत बिगाड़ने और मृत्यु का जोखिम बढ़ाने में एएमआर निर्णायक कारक साबित हुआ।
यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे मौन महामारी करार दे रहे हैं। अनुमान है कि 2050 तक हर साल करीब 1 करोड़ लोगों की मौत एएमआर से हो सकती है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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