मेडिकल साइंस में पर्सनालिटी, गतिविधियों और शारीरिक सक्रियता के आधार पर लोगों को दो हिस्सों में बांटा गया है- मार्निंग या डे पर्सन और दूसरा नाइट पर्सन जिसे नाइट पर्सन भी कहा जाता है। मार्निंग पर्सन का मतलब वे लोग जिनका दिमाग सुबह-दिन के समय अधिक सक्रिय होता है, सुबह आसानी से जल्दी उठ जाते हैं। इसके विपरीत नाइट पर्सन की सबसे अधिक उत्पादकता शाम या रात में देखी जाती है, हालांकि ये लोग रात में देर से सोते हैं और सुबह देर से उठते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं आपकी पर्सनालिटी, सेहत और खान-पान के तरीकों को प्रभावित करती है।
Study: आप 'डे पर्सन हैं या नाइट'? नाइट पर्सन में समय से पहले मृत्यु का खतरा अधिक, जानिए शोध की रोचक बातें
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नाइट VS मार्निंग पर्सन
नाइट पर्सन की लाइफ कम क्यों मानी जाती है, इसे समझने से पहले यह जानलेना आवश्यक है कि आपकी आदतों के अलावा कुछ जीन्स भी हैं जो निर्धारित करते हैं कि आप मार्निंग पर्सन होंगे या नाइट।
हम सभी के शरीर में एक आंतरिक घड़ी होती है जो हमारे सोने/जागने के चक्र सहित हमारे जीवन के कई पहलुओं को नियंत्रित करने में मदद करती है। यह घड़ी मुख्यरूप परिवेश के प्रकाश पर चलती है, यही कारण है कि जब बाहर अंधेरा होता है तो हमें नींद आती है और दिन के समय हम सक्रिय रहते हैं।
एक अध्ययन में डिले स्लीप फेज डिसऑर्डर (नाइट पर्सन) वाले लोगों में CRY1 नामक जीन में आनुवंशिक परिवर्तन देखा गया है, जो इनमें सामान्य निर्धारित समय से देर में नींद आने की समस्या का कारण बनती है।
आइए अब अध्ययन पर वापस चलते हैं।
नाइट पर्सन में समय से पहले मृत्यु का खतरा
शोधकर्ताओं की टीम ने दोनों प्रकार की पर्सनालिटी वाले लोगों की आदतों के विश्लेषण के आधार पर पाया कि आमतौर पर नाइट पर्सन में समय से पहले मृत्यु का खतरा अधिक हो सकता है, जिसका प्रमुख कारण शराब-धूम्रपान की प्रवृत्ति मानी जाती है।
क्रोनोबायोलॉजी इंटरनेशनल जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में 23,000 से अधिक लोगों के स्वास्थ्य और जीवन शैली के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। 37 साल तक चले इस शोध में प्रतिभागियों में से 8700 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई। इनमें से ज्यादातर वो लोग थे, जिन्हें नाइट पर्सन के रूप में वर्गीकृत किया गया था और इनमें शराब-धूम्रपान की आदत भी अधिक थी।
कई कारक हो सकते हैं जिम्मेदार
फिनलैंड स्थित हेलसिंकी यूनिवर्सिटी में आनुवंशिक महामारी विज्ञान जाक्को काप्रियो कहते हैं, इस शोध के दौरान हमने उन कारकों को समझने की कोशिश की जो लोगों की मृत्युदर को बढ़ाने वाले हो सकते थे। इसमें पाया गया कि नाइट पर्सन में बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई), क्रोनिक बीमारियों का खतरा, शराब-धूम्रपान आदत अधिक थी। साथ ही इनमें से ज्यादातर लोग नींद विकारों के भी शिकार थे। ये सभी स्थितियां शरीर में इंफ्लामेशन को बढ़ाने और मेटाबॉलिज्म को प्रभावित करने वाली हो सकती हैं, जो सीधे तौर पर जानलेवा समस्याओं का कारक हैं।
अध्ययनकर्ताओं ने प्रतिभागियों में इन कारकों को नियंत्रित करने के बाद पाया कि अगर लाइफस्टाइल को ठीक कर लिया जाए तो नाइट पर्सन के समय से पहले मृत्युदर के जोखिमों को 9 फीसदी तक कम किया जा सकता है।
क्या कहते हैं शोधकर्ता?
प्रोफेसर कैप्रियो कहते हैं, यह स्पष्ट नहीं है कि नाइट पर्सन वालों में धूम्रपान और शराब पीने की अधिक आदत के क्या कारण हैं? संभवत: ये नींद न आने के दुष्प्रभावों को कम करने के शुरुआती प्रयास हो सकते हैं जो समय के साथ आदत बनती जाती है और अधिक गंभीर समस्याओं का कारण बनती है।
शोध में यह जरूर रेखांकित किया गया है कि अगर आप लाइफस्टाल को ठीक करते हैं तो जोखिमों को कम किया जा सकता है, पर ज्यादा जरूरी है कि हम सोने-जागने के समय को ठीक करें। जब तक आंतरिक घड़ी खराब रहेगी, सेहत ठीक नहीं किया जा सकता है।
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स्रोत और संदर्भ
Chronotype and mortality - a 37-year follow-up study in Finnish adults
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