पूरी दुनिया पिछले डेढ़ साल से अधिक समय से कोरोना संक्रमण का कहर झेल रही है। पिछले एक दशक में देखे तो कोविड-19, विश्वभर के लिए सबसे घातक बीमारी बनकर सामने आया है। इसका अंदाजा इसी बात लगाया जा सकता है कि पिछले डेढ़ साल में कोरोना संक्रमण के कारण 48.07 लाख से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। हालांकि इस बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कोरोना से भी घातक संक्रमण के बारे में लोगों को आगाह किया है। संक्रामक रोग विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा समय में कोरोना के साथ फ्लू का भी प्रकोप चल रहा है। फ्लू का संक्रमण कोरोना से ज्यादा घातक हो सकता है, इंसानों के लिए यह एक गंभीर और वास्तविक जोखिम का कारण बना हुआ है।
महामारी विशेषज्ञ की चेतावनी: कोरोना से भी ज्यादा घातक है यह संक्रमण, करोड़ों लोगों की मौत का बन सकता है कारण
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इन्फ्लूएंजा का खतरा बरकरार
प्रोफेसर माइकल ओस्टरहोम कहते हैं, कोरोना से पहले इन्फ्लूएंजा महामारी मनुष्यों के जोखिम का प्रमुख कारण बनी हुई थी, इसमें फिलहाल कोई बदलाव नहीं आया है। साल 1918 से 2018 के बीच 100 वर्षों के दौरान दुनिया ने चार बार इन्फ्लूएंजा महामारी का प्रकोप झेला है। यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि इन्फ्लूएंजा महामारी का जोखिम गंभीर और बेहद खतरनाक हो सकता है। इन्फ्लूएंजा की पांचवी महामारी भी आ सकती है, लेकिन कब, इस बारे में फिलहाल कुछ स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है।
इन्फ्लूएंजा के कारण हर साल जाती हैं लाखों जानें
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा कई अन्य संगठनों के साथ-साथ मौसमी फ्लू के खिलाफ टीके विकसित करने के लिए एक रोडमैप के शुभारंभ कार्यक्रम में बोलते हुए ओस्टरहोम ने इन्फ्लूएंजा महामारी के प्रकोप को लेकर चिंता जताई। ओस्टरहोम कहते हैं, ऐसी आशंका है कि इस साल इन्फ्लूएंजा के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।
आंकड़ों पर गौर करें तो हर साल औसतन 5 लाख से अधिक लोगों की जान इन्फ्लुएंजा संक्रमण के कारण चली जाती है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है। दुनिया ने हर 25 साल में एक बार इन्फ्लूएंजा महामारी झेली है। इसका खतरा अब भी बना हुआ है।
इन्फ्लुएंजा के खिलाफ प्रभावी टीके की जरूरत
स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता है कि समय के साथ इन्फ्लुएंजा का कारण बनने वाले वायरस के वैरिएंट्स में भी बदलाव देखने को मिल रहा है, वहीं वर्तमान फ्लू के टीके पहली बार 1940 के दशक में विकसित की गई तकनीक पर आधारित हैं। डब्ल्यूएचओ में वैक्सीन विशेषज्ञ डॉ मार्टिन फ्रीड कहते हैं कि पिछले 10 वर्षों में टीके के विकास में वृद्धिशील सुधार तो हुआ है लेकिन हमारे पास अभी भी कोई ऐसा एक टीका नहीं है जो लंबे समय तक मजबूती से लोगों को इन्फ्लुएंजा के तमाम वैरिएंट्स से सुरक्षा देता रह सके। इस दिशा में काम करने की आवश्यकता है।
इन्फ्लूएंजा से लोगों को सुरक्षित रखना आवश्यक
वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस तरह से इन्फ्लुएंजा के गंभीर खतरों के साक्ष्य मिल रहे हैं, इससे बचाव के लिए हमें एक ऐसे वैक्सीन की जरूरत है जो इन्फ्लुएंजा के कारक तमाम वैरिएंट्स को एक साथ लक्षित कर सके और निम्न तथा मध्यम आय वाले देशों में इस्तेमाल किया जा सकता था। विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना महामारी से सबक लेते हुए इन्फ्लूएंजा से लोगों के बचाव के लिए तत्काल प्रभावी टीके की आवश्यकता है, जिससे किसी गंभीर खतरे से लोगों को सुरक्षित रखा जा सके।
------------------
नोट: यह लेख मिनेसोटा विश्वविद्यालय में सेंटर फॉर इंफेक्शियस डिजीज रिसर्च एंड पॉलिसी के निदेशक प्रोफेसर माइकल ओस्टरहोम के संबोधन के आधार पर तैयार किया गया है।
अस्वीकरण: अमर उजाला के हेल्थ एंड फिटनेस कैटेगिरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर और विशेषज्ञों,व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं. लेख में उल्लेखित तथ्यों और सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा परखा व जांचा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठकों की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और ना ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श करें।