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कोरोना के दुष्प्रभाव: बच्चों में तीन गुना तक बढ़ी मायोपिया की समस्या, जानिए इसके कारण और बचाव के तरीके

Mon, 28 Jun 2021 01:05 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Abhilash Srivastava Updated Mon, 28 Jun 2021 01:05 PM IST
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myopia cases in children incrised due to lockdown and covid-19
बच्चों में बढ़ी मायोपिया की समस्या (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

Medically Reviewed by-


डा. कमल बी कपूर
(मेडिकल डायरेक्टर)
शार्प साईट आई हॉस्पिटल्स
अनुभव- 25 वर्ष


दुनियाभर में पिछले डेढ़ साल से कोरोना का कहर जारी है। अब तक आ चुकी दो लहरों ने लोगों की सेहत को बुरी तरह से प्रभावित किया है। कोरोना संक्रमण के कारण कुछ लोगों में हृदय और फेफड़ों की गंभीर समस्याएं देखने को मिली हैं। डॉक्टरों का कहना है कि कोरोना का अप्रत्यक्ष रूप से बच्चों में भी गंभीर असर देखा जा रहा है। कोरोना के कारण बच्चों में मायोपिया की समस्या तेजी से बढ़ रही है। मायोपिया, आंखों में होने वाली समस्या है जिसमें लोगों को पास की चीजें तो स्पष्ट दिखती हैं लेकिन दूर की चीजों को देखने में उन्हें खासा दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। नेत्र रोग विशेषज्ञों की मानें तो कोरोना काल में बिगड़े जीवनचक्र ने बच्चों में इस समस्या को तीन गुना तक बढ़ा दिया है। इस तरह की समस्या विशेषकर छोटे बच्चों में ज्यादा देखी जा रही है। मायोपिया को सामान्य बोलचाल की भाषा में निकट दृष्टिदोष के रूप में जाना जाता है।
आइए इस लेख में नेत्र रोग विशेषज्ञ से जानने की कोशिश करते हैं कि बच्चों में मायोपिया की समस्या बढ़ने का क्या कारण हो सकता है, साथ ही इससे बच्चों को कैसे बचाया जा सकता है?

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निकट दृष्टिदोष की समस्या (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

क्या है मायोपिया की समस्या?
नेत्र रोग विशेषज्ञों के मुताबिक निकट दृष्टिदोष (मायोपिया) दृष्टि में विकार से संबंधित समस्या है, जिसमें रोगी को अपने निकट की वस्तुएं तो स्पष्ट रूप से देखती हैं, लेकिन दूर की वस्तुएं धुंधली दिखाई पड़ती हैं। इसमें आंख का आकार बदल जाता है। सामान्यतौर पर आंख की सुरक्षात्मक बाहरी परत कॉर्निया के बड़े हो जाने के कारण ऐसी समस्या हो सकती है। ऐसी स्थिति में आंख में प्रवेश करने वाला प्रकाश ठीक से फोकस नहीं कर पाता है। मायोपिया में आंख की पुतली (आई बॉल) का आकार बढ़ने से प्रतिबिंब रेटिना पर बनने की बजाय थोड़ा आगे बनता है।

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बच्चों में देखी जा रही मायोपिया की समस्या - फोटो : Social Media

बच्चों में क्यों बढ़ रही है मायोपिया की समस्या?
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ कमल बी कपूर बताते हैं कि कोविड की शुरुआत से ही सुरक्षा के मद्देनजर बच्चों का घरों में ज्यादा समय बीतने लगा। इससे उनका बाहर खेलना कूदना कम हो गया और घर के भीतर मोबाइल पर ज्यादा समय बीतने लगा। कोविड के बाद बच्चों में देखी जा रही मायोपिया की समस्या के लिए इन दो कारणों को प्रमुख माना जा रहा है। यह प्रमाणित है कि जो बच्चे बाहर ज्यादा खेलते हैं उनमें इस तरह की समस्याओं के विकसित होने का खतरा कम होता है। कोविड के दौरान हुए कई अध्ययनों में पाया गया है कि प्री-स्कूल यानी कि 6-9 साल की आयु वाले बच्चों के लाइफस्टाइल में आए बदलाव के कारण मायोपिया की समस्या ज्यादा देखी जा रही है। 

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बच्चों में स्क्रीन टाइम का बढ़ना समस्या का विषय - फोटो : pixabay

मोबाइल का इस्तेमाल बच्चों के लिए ज्यादा चिंताकारक
डॉ कमल बी कपूर बताते हैं कि कोविड काल में बच्चों का पास का कम जैसे ऑनलाइन क्लास और गेम खेलना बढ़ गया। जब हम कोई पास का काम करते हैं तो आंखों को अपनी स्थिति और आकार में परिवर्तन करना पड़ता है। इसमें आंख अस्थाई रूप से माइनस पावर की ओर चली जाती है, जोकि काम खत्म होने के बाद स्वाभाविक स्थिति में आ जाती है, यह प्रक्रिया प्राकृतिक है। छोटे बच्चों में देखा गया है कि बच्चा अगर लगाता पास का काम करता है तो आंख धीरे-धीरे स्थाई रूप से माइनस पावर की ओर जाने लगती है। इसमें आंख का आकार बड़ी हो जाती है।
पास के काम का मतलब मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल, किताबों को झुक कर पढ़ना या ऑनलाइन गेम ज्यादा खेलना आदि।

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बच्चों को मायोपिया से बचाएं - फोटो : Social media

बच्चों को मायोपिया से कैसे बचाएं?
डॉ कमल बी कपूर बताते हैं कि बच्चों को मोबाइल से जितना दूर रख सकें उतना बेहतर है। मोबाइल का इस्तेमाल चूंकि आंखों के ज्यादा करीब लाकर करना होता है ऐसे में यह मायोपिया की समस्या को जन्म दे सकती है। इसके अलावा बच्चों में सीधे बैठ कर पढ़ने की आदत डलवाएं, ज्यादा झुक कर या किताबों को ज्यादा पास लाकर पढ़ने से भी इस रोग के विकसित होने का खतरा हो सकता है। बच्चों का खाली समय मोबाइल से ज्यादा पार्कों में बीते, यह सुनिश्चित करना माता-पिता के लिए बेहद जरूरी है।

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नोट: यह लेख शार्प साईट आई हॉस्पिटल्स के मेडिकल डायरेक्टर डा. कमल बी कपूर के सुझावों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें। 

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