दुनियाभर में कोरोना संक्रमण के एक बार फिर से तेजी से बढ़ते मामले स्वास्थ्य संगठनों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। इससे बड़ी चिंता यह है कि कोरोना के नए वैरिएंट्स अधिक संक्रामक और शरीर की प्रतिरक्षा को आसानी से चकमा देने वाले बताए जा रहे हैं। इन सबके बीच कुछ अध्ययनों में दावा किया जा रहा है कि वैक्सीनेशन से बनी एंटीबॉडीज कुछ महीनों में कम हो जा रही हैं, ऐसे में लोगों को नए वैरिएंट्स से सुरक्षित रहने के लिए बूस्टर डोज की आवश्यकता हो सकती है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए हाल ही में यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने इम्युनोकॉम्प्रोमाइज्ड लोगों के लिए फाइजर/ बायोएनटेक या मॉडर्ना के टीकों की तीसरी खुराक लेने को मंजूरी दे दी है।
कोरोना से जंग: एफडीए ने ऐसे लोगों को दी तीसरे डोज की मंजूरी, जानिए क्या आपको भी है बूस्टर शॉट की जरूरत?
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क्या है यह बूस्टर शॉट?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कोविड की ज्यादातर वैक्सीन दो शॉट पर आधारित हैं। कोरोना के नए और अपेक्षाकृत अधिक संक्रामक वैरिएंट्स को देखते हुए लोगों को तीसरी खुराक के रूप में वैक्सीन की बूस्टर डोज देने की आवश्यकता महसूस हो रही है। माना जा रहा है कि बूस्टर शॉट वायरस के खिलाफ बेहतर सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं। बूस्टर शॉट में क्या लोगों को वही वैक्सीन देनी चाहिए जिसकी वह पहले दो डोज ले चुके हैं, या किसी अन्य कंपनी का टीका शरीर की प्रतिरक्षा को अधिक मजबूती दे सकता है? इस बारे में जानने के लिए फिलहाल अध्ययन किया जा रहा है।
इम्युनोकॉम्प्रोमाइज्ड लोगों के लिए क्यों जरूरी माना जा रहा है तीसरा शॉट?
स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, कमजोर प्रतिरक्षा वाले लोगों में कोरोना संक्रमण होने का अधिक खतरा होने के साथ गंभीर बीमारी और उसके कारण मृत्यु का जोखिम भी अधिक होता है। ऐसे लोग पूरी तरह से टीकाकरण के बाद भी संक्रमण के शिकार हो सकते हैं। चूंकि कुछ अध्ययनों में कहा जा रहा है कि वैक्सीन से बनी प्रतिरक्षा भी कुछ महीनों में कम हो जाती है, ऐसी स्थिति में इन लोगों के लिए तीसरा डोज बेहद आवश्यक हो गया है।
रोग नियंत्रण और रोकथाम केंद्र (सीडीसी) के निदेशक रोशेल वालेंस्की के अनुसार, “चूंकि दुनियाभर में डेल्टा वैरिएंट्स तेजी से बढ़ रहे हैं, ऐसे में कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाले लोगों के लिए वैक्सीन की एक अतिरिक्त खुराक, गंभीर संक्रमण से सुरक्षा देने में सहायक हो सकती है।
इम्युनोकॉम्प्रोमाइज्ड किन्हें माना जाता है?
सीडीसी के मुताबिक कुछ विशेष स्वास्थ्य स्थितियों के आधार पर इम्युनोकॉम्प्रोमाइज्ड लोगों का निदान किया जाता है। ऐसे लोगों को कोरोना वैक्सीन की तीसरी खुराक लेना जरूरी है।
- ट्यूमर और ब्लड कैंसर का इलाज करवा रहे लोग।
- एचआईवी संक्रमण के शिकार।
- जिन लोगों का अंग प्रत्यारोपण हुआ है।
- जिन लोगों का स्टेम सेल ट्रांसप्लांट हुआ और वे इम्यूनोसप्रेसेन्ट दवाएं ले रहे हैं।
- जिन लोगों को किसी रोग के उपचार के तौर पर हाई डोज वाले कॉर्टिकोस्टेरॉइड दवा की आवश्यकता पड़ रही हो।
भारत में कोरोना के संक्रमण की स्थिति
भारत में प्रमुख रूप से कोरोना के अल्फा और डेल्टा वैरिएंट्स के कारण संक्रमण के मामले सबसे ज्यादा देखने को मिले हैं। बीटा और गामा वैरिएंट भी कुछ स्थानों पर संक्रमण के मामलों का कारण माने जा रहे हैं। दुनियाभर के वैज्ञानिकों का कहना है कि डेल्टा वैरिएंट्स, वैक्सीनेशन से तैयार शरीर की प्रतिरक्षा को चकमा देने की क्षमता रखते हैं, हालांकि टीके, संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती होने के खतरे को जरूर कम कर सकते हैं। कई अध्ययनों में कहा जा रहा है कि शरीर में वैक्सीन से बनी एंटीबॉडीज कुछ महीनों में कमजोर पड़ने लगती हैं, ऐसे में लोगों को आने वाले दिनों में बूस्टर शॉट की आवश्यकता हो सकती है। वैज्ञानिकों के मुताबिक भारत में भी आने वाले दिनों में लोगों को बूस्टर शॉट की आवश्यकता हो सकती है।
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नोट: यह लेख तमाम अध्ययनो की रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया गया है।
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