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Interview: मातृ-शिशु मृत्युदर में हुआ है सुधार, पर कई स्वास्थ्य जटिलताएं अब भी बड़ी चिंता

Abhilash Srivastava अभिलाष श्रीवास्तव
Updated Tue, 14 Feb 2023 06:19 PM IST
सार

भारत के ग्रामीण हिस्सों में अब भी कई प्रकार की चुनौतियां देखी जा रही हैं। समय रहते बच्चों में स्वास्थ्य समस्याओं का निदान न हो पाने के कारण जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर असर का खतरा रहता है। यूनिसेफ, बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और बाल अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार प्रयासरत है।

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How To Improving Survival In Child And Reduce The Risk Of Infant Mortality In Hindi
मां-बच्चे की सेहत पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता - फोटो : amarujala

विस्तार

वैश्विक स्तर पर नवजात मृत्युदर लंबे समय से एक गंभीर समस्या रही है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जन्म के पहले 30 दिन काफी नाजुक होते हैं, इसमें शिशु को विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। यही वह समय भी होता है जिसमें बच्चों की मौत के सबसे अधिक मामले रिपोर्ट किए जाते हैं। हालांकि मेडिकल के क्षेत्र में पिछले एक दशक में हुई क्रांतिकारी प्रगति के चलते इसमें बेहतर सुधार देखा जा रहा है।

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यूनाइटेड नेशंस इंटरनेशनल चिल्ड्रन इमरजेंसी फंड (यूनिसेफ) के आंकड़ों के मुताबिक 1990 में जहां जन्म के पहले महीने में 1000 में से औसत 37 बच्चों की मौत हो जाती थी, वहीं 2021 में यह आंकड़ा घटकर 18 हुआ है। भारत ने भी शिशु मृत्युदर को रोकने में काफी बेहतर काम किया है। साल 2019 में प्रति हजार बच्चों में 22 की मृत्यु हो जाती थी उसमें सुधार होकर यह  2020 में 20 हो गई है।
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महिला और बाल रोग विशेषज्ञों की मानें तो नवजात मृत्युदर का प्रमुख कारण गर्भावस्था में  पोषण की कमी, गर्भ में पले रहे शिशु में कई प्रकार की बीमारियां और कुछ आनुवांशिक कारक हो सकते हैं। दो-तीन दशक पहले जब उन्नत स्तर के मेडिकल उपकरणों और जांच की कमी थी तो बच्चों में इस प्रकार की समस्याओं का समय रहते निदान कठिन था, हालांकि अब हम आसानी से गर्भ में ही शिशु की स्थिति और जटिलताओं के बारे में आसानी से समझते हुए उसका समय रहते इलाज करने में सफल हो रहे हैं। 
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भारत के ग्रामीण हिस्सों में अब भी कई प्रकार की चुनौतियां देखी जा रही हैं। समय रहते बच्चों में स्वास्थ्य समस्याओं का निदान न हो पाने के कारण जीवन की गुणवत्ता पर गंभीर असर देखा जा रहा है। यूनिसेफ बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य और बाल अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार प्रयासरत है। यूनिसेफ इंडिया और अमर उजाला फाउंडेशन की भागीदारी के तहत बच्चों में जन्मजात बीमारियों के जोखिम और बचाव के उपायों के बारे में जानने के लिए हमने महिला रोग विशेषज्ञ डॉ दीप्ति गुप्ता से बातचीत की। आइए इस बारे में विस्तार से समझते हैं।

 

मां का पोषण शिशु स्वास्थ्य के लिए आवश्यक

गर्भ में पल रहे शिशु को आहार और पौष्टिकता मां से प्राप्त होती है, इसलिए सबसे आवश्यक है कि गर्भवती को आहार के माध्यम से शरीर के आवश्यक सभी पोषक तत्व प्राप्त होते रहें। गर्भवती का आहार जिस प्रकार का होगा, उसका सीधा असर पल रहे शिशु के स्वास्थ्य पर होता है। यदि गर्भवती एनीमिया या डायबिटीज की शिकार है तो यह शिशु के लिए भी समस्याकारक स्थिति हो सकती है। 
 

  • प्रीटर्म बर्थ के मामले काफी रिपोर्ट हो रहे हैं, यह कितनी जटिल स्थिति है?

डॉ दीप्ति गुप्ता बताती हैं, समय से पहले बच्चे का जन्म मां और नवजात दोनों के लिए समस्याकारक हो सकता है। गर्भ में बच्चे के पूर्ण विकास की अवधि नौ माह की होती है, इससे पहले जन्म के कारण कई प्रकार की विकासात्मक और स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा रहता है। प्रसव के अनुमानित तारीख से तीन सप्ताह या उससे पहले जन्म को प्रीटर्म बर्थ  कहा जाता है। दूसरे शब्दों में, गर्भावस्था के 37वें सप्ताह की शुरुआत से पहले का जन्म प्री-मेच्योर माना जाता है। जिन लोगों को समय से पहले प्रसव पीड़ा होती है उनमें चिंता विकार, प्रसवोत्तर अवसाद (पोस्टपार्टम डिप्रेशन) पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (पीटीएसडी) जैसी समस्याओं का जोखिम अधिक होता है।
 

  • समय से पहले जन्म का बच्चे की सेहत पर क्या असर होता है?

समय से पहले जन्मे बच्चों में क्रोनिक बीमारियों के विकसित होने का खतरा अधिक देखा गया है। ऐसे बच्चों में संक्रमण, अस्थमा, हृदय रोग और न्यूरोलॉजिकल समस्याएं अधिक हो सकती हैं। समय से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं में सडेन इंफैंट डेथ सिंड्रोम (एसआईडीएस) के मामले भी अधिक रिपोर्ट किए जाते रहे हैं। ऐसे बच्चों को जन्म के लंबे समय तक अस्पताल में नियोनेटल इंटेंसिव केयर यूनिट (एनआईसीयू) में रखने की आवश्यकता हो सकती है।
 

  • प्रीटर्म बर्थ के क्या कारण हैं और इससे बचाव के लिए क्या किया जाना चाहिए?

डॉ दीप्ति बताती हैं कई कारण हैं जो समय से पहले प्रसव की स्थितियों का कारण बन सकते हैं। यदि महिला के गर्भाशय, गर्भाशय ग्रीवा या प्लेसेंटा में कुछ दिक्कतें हैं, या फिर एमनियोटिक फ्ल्यूड (गर्भ में थैली में भरा द्रव) और जननांग पथ में संक्रमण की स्थिति है तो इसमें समय से पहले प्रसव कराने की जरूरत हो सकती है। यदि गर्भवती को हाई ब्लड प्रेशर-डायबिटीज जैसी समस्या है तो भी  प्रीटर्म बर्थ का खतरा अधिक होता है। 

How To Improving Survival In Child And Reduce The Risk Of Infant Mortality In Hindi
शिशु स्वास्थ्य समस्याओं के बारे में जानिए - फोटो : istock

बच्चा अधिक वजन का पैदा हो रहा है, यह हष्ट-पुष्ट होने का संकेत नहीं

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जन्म के समय बच्चे का वजन सामान्य होना बहुत आवश्यक है। औसत 2.5- 3.5 किलोग्राम तक के बच्चों को स्वस्थ माना जाता है, पर इससे अधिक या कम दोनों वजन स्वास्थ्य जटिलताओं के कारक हैं। यदि बच्चा 4 किलोग्राम या उससे अधिक वजन का है तो इसका बिल्कुल मतलब नहीं कि वह हष्ट-पुष्ट है। अधिक वजन वाले बच्चों में स्वास्थ्य जटिलताएं हो सकती हैं।
 

  • जन्म के समय कम या अधिक वजन से क्या दिक्कतें हो सकती हैं?

डॉ दीप्ति कहती हैं, भारत में लो-बर्थ वेट वाले मामले अधिक देखे जाते रहे हैं, 2.5 किलो से कम वजन के बच्चे का मतलब गर्भावस्था के दौरान मां से उसे पर्याप्त पोषण नहीं मिला है। यह मां के आहार में कमी या फिर कुछ बीमारियों के कारण हो सकता है। वहीं जिन गर्भवती को डायबिटीज की समस्या होती है उनके बच्चों का वजन अधिक होने का खतरा रहता है। इसका प्रमुख कारण मां से बच्चे को मिल रहा अतिरिक्त ग्लूकोज है, जो बच्चे में मोटापे का कारण बनता है।

ऐसे बच्चों में जन्म के बाद हाइपोग्लाइसेमिया (लो ब्लड शुगर) का जोखिम अधिक होता है। जब बच्चे जन्म के बाद मां से अलग होते हैं, तो शरीर को लगातार मिल रहे ग्लूकोज में अचानक कमी आ जाती है, जिसके कारण ब्लड शुगर की समस्या के चलते बेहोशी, ब्रेन इंजरी और विकासात्मक समस्याओं का खतरा हो सकता है। 

गर्भावस्था के दौरान और जन्म के बाद की बीमारियां

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, दो-तीन दशक पहले तक उपकरणों और जांच की कमी के कारण भ्रूण की समस्याओं का पता नहीं चल पाता था। हालांकि अब सोनोग्राफी की मदद से समस्याओं का निदान और उपचार आसान हो गया है। गर्भ के पहले 5 महीनों में 3 सोनोग्राफी आवश्यक होती है, जिससे भ्रूण की स्थिति का सही अंदाजा लगाया जा सके। 
 

  • गर्भकालीन शिशु और नवजात में किस तरह की समस्याएं अधिक देखी जा रही हैं?

डॉ दीप्ति बताती हैं, अगर गर्भावस्था के दौरान सही जांच की जाएं तो कई प्रकार की जटिलताओं का समय रहते निदान किया जा सकता है। 

डाउन सिंड्रोम की समस्या- गर्भावस्था में सही जांच के माध्यम से 80-90 फीसदी मामलों में डाउन सिंड्रोम का पता चल जाता है। बच्चे में अतिरिक्त क्रोमोसोम के कारण यह समस्या होती है। क्रोमोसोम शरीर में जीन के छोटे पैकेज होते हैं जो निर्धारित करते हैं कि गर्भावस्था के दौरान और जन्म के बाद बच्चे का शरीर कैसे बनता और कैसे कार्य करता है। आमतौर पर, एक बच्चे में 46 क्रोमोसोम होते हैं, इसकी अधिकता डाउन सिंड्रोम का कारण बन सकती है। इस स्थिति में बच्चा शारीरिक या मानसिक अथवा दोनों प्रकार से समस्याग्रस्त हो सकता है। 

सेरेब्रल पाल्सी- यह बच्चों में होने वाला न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जो जन्म से पहले या जन्म के समय होने वाले ब्रेन डैमेज के कारण होती है। इसके कारण बच्चे में विकलांग्ता की समस्या हो सकती है। डॉ दीप्ति बताती हैं वैसे तो सेरेब्रल पाल्सी के कई कारण हो सकते हैं, जिसमें एक कारण प्रसव के दौरान बच्चे में ऑक्सीजन की कमी होना भी है। इसीलिए सुरक्षित प्रसव को लेकर जागरूकता बहुत आवश्यक है।

हृदय रोगों का समस्या- कॉग्नेटल हार्ट डिजीज (सीएचडी) ऐसी स्थितियां हैं जो जन्म के समय मौजूद होती हैं और बच्चे के दिल की संरचना और इसके काम करने के तरीके को प्रभावित कर सकती हैं। इसे सबसे आम प्रकार का जन्मजात दोष माना जाता है। ऐसे बच्चों में पहले मृत्युदर काफी अधिक देखा जाता था हालांकि अब बेहतर चिकित्सा देखभाल और उपचार उन्नत के कारण ऐसे बच्चे स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
 

How To Improving Survival In Child And Reduce The Risk Of Infant Mortality In Hindi
मातृ-शिशु स्वास्थ्य - फोटो : istock

मातृ-शिशु स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी

यूनिसेफ लगातार जागरूकता अभियान के माध्यम से मातृ-शिशु स्वास्थ्य को लेकर लोगों को शिक्षित करने के लिए प्रयास कर रहा है। डॉ दीप्ति कहती हैं, इस दिशा में बेहतर सुधार देखा जा रहा है। अब ग्रामीण हिस्सों में भी जागरूकता बढ़ी है जिससे गर्भावस्था में बेहतर पोषण मिल पा रहा है, परिणामस्वरूप गर्भपात और बाल रोगों में कमी आई है, हालांकि अब भी और बेहतर करने की आवश्यकता है। बच्चों के बेहतर और स्वस्थ भविष्य के लिए मां का स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। देर से शादियां और 35 की आयु के बाद गर्भधारण भी मां बच्चे के लिए जटिलताओं को बढ़ाने वाली मानी जाती है। 

मातृ-शिशु स्वास्थ्य के लिए पोषण की विशेष भूमिका है। बच्चे को मां का दूध जरूर मिले यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए। समय-समय पर आवश्यक टीकाकरण, शिशु के आहार का ध्यान रखकर हम उन्हें कई बीमारियों से बचा सकते हैं। बेहतर भविष्य के लिए बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीरता से ध्यान दें। 



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्ट्स और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सुझाव के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।

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