दुनिया भर के अस्पताल इन दिनों कोविड-19 के मरीजों से भरे हैं। इस वायरस से दुनिया में अब तक ढाई लाख से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है। मरने वालों में ज्यादातर वो लोग हैं जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है। लेकिन ऐसा नहीं है कि दूसरों को इससे खतरा नहीं। कोरोना से मरने वालों में बहुत से नौजवान और सेहतमंद लोग भी शामिल हैं।
कोरोना वायरस: आपका इम्यून सिस्टम ही आपके शरीर पर ही हमला कर दे तो क्या होगा?
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जब हमारा इम्यून सिस्टम जरूरत से ज्यादा सक्रिय होकर रोगों से लड़ने के बजाय हमारे शरीर को ही नुकसान पहुंचाने लगता है, तो उसे 'साइटोकाइन स्टॉर्म' कहते हैं। इसमें इम्यून सेल फेफड़ों के पास जमा हो जाते हैं और फेफड़ों पर हमला करते हैं। इस प्रक्रिया में खून की नसें फट जाती हैं। उनसे खून रिसने लगता है और खून के थक्के बन जाते हैं।
नतीजतन शरीर का ब्लड प्रेशर कम हो जाता है। दिल, गुर्दे, फेफड़े और जिगर जैसे शरीर के नाजुक अंग काम करना बंद करने लगते हैं या कह सकते हैं कि ये शिथिल पड़ने लगते हैं। इस स्थिति को जांच और इलाज के बाद नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन कोविड-19 के मरीजों में इसे काबू करने के लिए क्या तरीका हो सकता है, फिलहाल कहना मुश्किल है।
कोमा में भी जा सकते हैं मरीज
शरीर में जब भी साइटोकाइन स्टॉर्म होता है तो ये सेहतमंद कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है। खून के लाल और सफेद सेल खत्म होने लगते हैं और जिगर को नुकसान पहुंचाते हैं। जानकारों का कहना है कि साइटोकाइन स्टॉर्म के दौरान मरीज को तेज बुखार और सिरदर्द होता है। कई मरीज कोमा में भी जा सकते हैं। ऐसे मरीज हमारी समझ से ज्यादा बीमार होते हैं। हालांकि अभी तक डॉक्टर इस परिस्थिति को महज समझ पाए हैं। जांच का कोई तरीका हमारे पास नहीं है।
कोविड-19 के मरीजों में साइटोकाइन स्टॉर्म पैदा होने की जानकारी दुनिया को वुहान के डॉक्टरों से ही मिली है। उन्होंने 29 मरीजों पर एक रिसर्च की और पाया कि उनमें आईएल-2 और आईएल-6 साइटोकाइन स्टोर्म के लक्षण थे।
वुहान में ही 150 कोरोना केस पर की गई एक अन्य रिसर्च से ये भी पता चला कि कोविड से मरने वालों में आईएल-6 सीआरपी साइटोकाइन स्टोर्म के मॉलिक्यूलर इंडिकेटर ज्यादा थे। जबकि जो लोग बच गए थे उनमें इन इंडिकेटरों की उपस्थिति कम थी। अमेरिका में भी कोविड के मरीजों में साइटोकाइन स्टॉर्म का प्रकोप ज्यादा देखा गया है।
डॉक्टरों का कहना है कि कोविड-19 के मरीजों में प्रतिरोधक क्षमता के सेल्स फेफड़ों पर बहुत जल्दी और इतनी तेजी से आक्रमण करते हैं कि फेफड़ों पर फाइब्रोसिस नाम के निशान बना देते हैं। ऐसा शायद वायरस की सक्रियता की वजह से होता है।
ऐसा पहली मर्तबा नहीं है कि साइटोकाइन स्टॉर्म का रिश्ता किसी महामारी से जोड़ कर देखा जा रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक 1918 में फैले फ्लू और 2003 में सार्स महामारी (सार्स महामारी का कारण भी कोरोना वायरस परिवार का ही एक सदस्य था) के दौरान भी शायद इसी वजह से बड़े पैमाने पर मौत हुईं थीं। और शायद एच1एन1 स्वाइन फ्लू में भी कई मरीजों की मौत, अपनी रोग प्रतिरोधक कोशिकाओं के बागी हो जाने की वजह से ही हुई थी।