एक समय था जब ब्लड कैंसर का नाम सुनते ही मरीज और परिवार के सामने इलाज को लेकर बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती थी। इलाज के विकल्प सीमित थे और मुख्य रूप से भारी कीमोथेरेपी या बोन मैरो ट्रांसप्लांट पर निर्भर रहना पड़ता था। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में मेडिकल साइंस में तेजी से बदलाव आया है।
आज ब्लड कैंसर के इलाज में ऐसी तकनीकें शामिल हो चुकी हैं, जो कैंसर कोशिकाओं को ज्यादा सटीक तरीके से निशाना बनाती हैं। टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और सीएआर-टी सेल थेरेपी ने इलाज की तस्वीर बदल दी है।
इम्यूनोथेरेपी: शरीर की अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता से कैंसर पर हमला
इम्यूनोथेरेपी ऐसी आधुनिक उपचार पद्धति है, जिसमें मरीज की अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यूनिटी को कैंसर से लड़ने के लिए सक्रिय किया जाता है। कई मामलों में इसे कीमोथेरेपी के साथ भी दिया जाता है, ताकि इलाज का असर बेहतर हो सके।
क्लासिक हॉजकिन लिंफोमा जैसे कुछ ब्लड कैंसर में इम्यूनोथेरेपी से इलाज के परिणामों में बड़ा सुधार देखा गया है। इस तकनीक ने कैंसर के खिलाफ शरीर की अपनी सुरक्षा व्यवस्था को इलाज का हिस्सा बना दिया है।
टार्गेटेड थेरेपी: कैंसर की खास कमजोरी पर सीधा वार
पारंपरिक कीमोथेरेपी में कैंसर कोशिकाओं के साथ शरीर की कुछ स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। टार्गेटेड थेरेपी का तरीका इससे अलग है। इसमें कैंसर पैदा करने वाले खास जीन या प्रोटीन को पहचानकर उन्हें निशाना बनाया जाता है।
- क्रोनिक मायलॉयड ल्यूकेमिया यानी सीएमएल इसका बड़ा उदाहरण है। 90 के दशक से पहले यह बीमारी बेहद जानलेवा मानी जाती थी। लेकिन इमैटिनिब यानी ग्लिवेक जैसी दवाओं के आने के बाद कई मरीज लंबे समय तक सामान्य जीवन जी पा रहे हैं।
- क्रोनिक लिम्फोसाइटिक ल्यूकेमिया यानी सीएलएल में भी पहले ज्यादा कठिन कीमोथेरेपी पर निर्भरता थी। अब टार्गेटेड दवाओं के रूप में गोलियों ने इलाज के विकल्प बढ़ाए हैं।
इसी तरह एएमएल-एम3 में भी बड़ा बदलाव आया है। 70-80 के दशक में इसे लगभग 100 प्रतिशत घातक माना जाता था, लेकिन टार्गेटेड दवाओं की मदद से आज यह पूरी तरह ठीक होने योग्य ब्लड कैंसर बन चुका है।