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Coronavirus Vaccine: चीन की कोरोना वैक्सीन कितनी सस्ती होगी और कितनी कारगर? जानिए सबकुछ

Sat, 12 Dec 2020 09:53 AM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सोनू शर्मा Updated Sat, 12 Dec 2020 09:53 AM IST
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CoronaVirus Vaccine China - फोटो : Pixabay/Amar Ujala

एक तरफ पूरी दुनिया में जल्द से जल्द कोविड-19 की वैक्सीन बनाने की होड़ दिख रही है, तो दूसरी ओर चीन की साइनोवैक कोरोना वैक्सीन अब विदेशों में पहुंचने लगी है। इस होड़ में चीन दूसरों से आगे निकलता दिख रहा है। चीन की बायोफार्मा कंपनी साइनोवैक की कोविड-19 वैक्सीन 'कोरोनावैक' इस्तेमाल के लिए इंडोनेशिया में पहुंच चुकी है। इसके अलावा इसके 18 लाख और डोज जनवरी तक यहां पहुंचाए जाएंगे। लेकिन वैक्सीन का आखिरी स्टेज का ट्रायल अभी नहीं हुआ है। इससे सवाल पैदा होता है कि ये वैक्सीन कितनी कारगर होगी। साथ ही ये भी कि इस चीनी वैक्सीन के बारे में अब तक हमें कितना पता है? 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

दूसरी वैक्सीन से कैसे अलग है साइनोवैक?

कोरोनावैक एक ऐसी वैक्सीन है जो एक्टिव नहीं की गई है। ये आपके शरीर के भीतर मरे हुए वायरस के कुछ हिस्से डालती है और आपके इम्यून सिस्टम को इस मृत वायरस से निपटने देती है। इससे आपका शरीर वायरस से लड़ना सीखता है और कोई गंभीर बीमारी भी नहीं होती यानी साइड इफेक्ट नहीं होता। मॉडर्ना और फाइजर वैक्सीन एमआरएनए वैक्सीन हैं, जिसका मतलब है कि कोरोना वायरस के जेनेटिक कोड को शरीर में इंजेक्ट किया गया है, जिससे शरीर वायरल प्रोटीन बनाने लगता है, लेकिन पूरा वायरस नहीं बनाता और इस तरह शरीर का इम्यून सिस्टम वायरस पर हमला करने के लिए तैयार हो जाता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock

ननयांग टैक्नोलॉजीकल यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफेसर लुओ दहाई ने बताया, 'कोरोनावैक पारंपरिक तरीके से बनाई गई वैक्सीन है। पहले भी कई जानी-मानी वैक्सीन बनाने के लिए इसी तरीके को अपनाया गया है।' वो रेबीज की वैक्सीन का उदाहरण देते हैं और कहते हैं, 'एमआरएनए वैक्सीन नई तरह की वैक्सीन हैं और फिलहाल उनका कोई सफल उदाहरण भी मौजूद नहीं है।' 

कागज पर देखें तो साइनोवैक के मुख्य फायदे ये हैं कि इसे सामान्य रेफ्रिजरेटर में 2-8 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर किया जा सकता है जैसे कि ऑक्सफोर्ड की वैक्सीन। मॉडर्ना की वैक्सीन को माइनस 20 डिग्री सेल्सियस पर और फाइजर की वैक्सीन को माइनस 70 डिग्री सेल्सियस पर स्टोर करना पड़ता है। इसका मतलब है कि साइनोवैक और ऑक्सफोर्ड वैक्सीन विकासशील देशों में ज्यादा उपयोगी साबित होंगी जो बड़ी संख्या में इतने कम तापमान पर वैक्सीन को स्टोर करने में सक्षम नहीं हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

कितनी असरदार है ये वैक्सीन?

फिलहाल तो इस पर कुछ कहना मुश्किल है। लांसेट जर्नल के मुताबिक, अभी कोरोनावैक के पहले और दूसरे चरण के ट्रायल के बारे में ही जानकारी उपलब्ध है। लांसेट में छपे इस पेपर के लेखक झू फेंगकी ने कहा कि इस वैक्सीन के पहले चरण में 144 लोगों ने हिस्सा लिया और दूसरे चरण में 600 लोगों ने। इस ट्रायल के नतीजे से पता चलता है कि इमरजेंसी की स्थिति में ये वैक्सीन इस्तेमाल के लिए ठीक है। सितंबर में साइनोवैक कंपनी के यिन ने कहा था कि 'वैक्सीन का परीक्षण हजार से ज्यादा लोगों पर किया गया है और उनमें से कुछ लोगों में ही थकान और थोड़ी परेशानी के लक्षण दिखे। ये पांच फीसदी से ज्यादा में नहीं दिखा।'  

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI

साइनोवैक का आखिरी चरण का ट्रायल अक्तूबर में ब्राजील में शुरू हुआ, जो दुनिया में कोरोना के मामलों में दूसरे नंबर पर है। लेकिन नवंबर में ट्रायल कुछ दिन के लिए रूक गया जब एक वॉलेंटियर की मौत की खबर आई। जब पता चला कि मौत का कारण वैक्सीन से संबंधित नहीं है तो फिर से ट्रायल शुरू हो गया। ब्राजील में साइनोवैक के पार्टनर बुटेनटेन संस्थान का कहना है कि साइनोवैक अपने ट्रायल के नतीजे 15 दिसंबर से पहले प्रकाशित कर देगा। प्रोफेसर लुओ बताते हैं कि फिलहाल कम जानकारी होने की वजह से वैक्सीन के असर को लेकर ज्यादा तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन शुरुआती डेटा के आधार पर कह सकते हैं कि कोरोनावैक एक असरदार वैक्सीन है, लेकिन अभी तीसरे चरण के ट्रायल के नतीजों का इंतजार करना चाहिए।

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