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Coronavirus: सांस रोकने से बढ़ सकता है कोरोना संक्रमण होने का खतरा, वैज्ञानिकों का हैरान करने वाला दावा
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: सोनू शर्मा
Updated Mon, 11 Jan 2021 05:15 PM IST
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कोरोना वायरस को लेकर लगातार शोध चल रहे हैं, जिसमें नए-नए खुलासे हो रहे हैं। अब एक ताजा अध्ययन में वैज्ञानिकों ने एक ऐसा खुलासा किया है, जो बेहद ही हैरान करने वाला है। आमतौर पर कई बार ऐसा होता है कि लोग कुछ देर के लिए अपनी सांस रोक लेते हैं, लेकिन इस नए अध्ययन में यह पाया गया है कि सांस रोकने से कोरोना संक्रमण होने का खतरा बढ़ सकता है। हैरान करने वाला यह शोध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान यानी आईआईटी मद्रास के शोधकर्ताओं ने किया है। इस नए शोध के निष्कर्षों को प्रतिष्ठित पत्रिका 'फिजिक्स ऑफ फ्लुइड्स' में भी प्रकाशित किया गया है।
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रिपोर्ट्स के मुताबिक, शोधकर्ताओं ने पहले एक प्रयोगशाला में सांस लेने की आवृत्ति का मॉडल तैयार किया कि कैसे वायरस वाली छोटी बूंद के प्रवाह की दर फेफड़ों में इसके जमा होना निर्धारित करती है। इसमें यह पाया गया कि सांस लेने की कम आवृत्ति कोरोना वायरस की उपस्थिति के समय को बढ़ाती है, जिससे वायरस के शरीर में जमा होने की संभावना बढ़ जाती है। इसीलिए लोग संक्रमित हो जाते हैं।
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आईआईटी-मद्रास के 'डिपार्टमेंट ऑफ एप्लाइड मैकेनिक्स' के प्रोफेसर महेश पंचागानुला कहते हैं, 'अध्ययन से यह पता चला है कि वायरस के कण कैसे फेफड़ों के भीतर पहुंचते हैं और वहां कैसे जमा होते हैं।' उन्होंने कहा कि अध्ययन का यह निष्कर्ष निकला कि सांस रोककर रखने और कम सांस लेने की दर से फेफड़ों में वायरस के जमने की संभावना बढ़ सकती है।
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प्रोफेसर पंचागानुला कहते हैं, 'इस अध्ययन से श्वसन संक्रमण के लिए बेहतर चिकित्सा और दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त हुआ है।' रिपोर्ट्स के मुताबिक, शोधकर्ताओं की टीम में प्रोफेसर पंचागानुला के अलावा आईआईटी मद्रास के ही शोधकर्ता अर्नब कुमार मलिक और सौमल्या मुखर्जी भी शामिल थे।
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कोरोना वायरस को लेकर ही हुए एक अन्य शोध में यह पाया गया है कि आईसीयू यानी गहन चिकित्सा इकाई में कोरोना मरीजों को दिमागी आघात का ज्यादा खतरा होता है। इस शोध में 14 देशों के 69 वयस्क मरीजों का अध्ययन किया गया है। यह शोध द लैंसेट रेस्पिरेटरी मेडिसिन जर्नल में प्रकाशित भी किया गया है।
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