कोरोना वायरस से दुनियाभर में 5000 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कोरोना से संक्रमण के मामले रोज ही बढ़ रहे हैं। आधिकारिक तौर पर महामारी घोषित हो चुका कोरोना भारत में भी दूसरे स्टेज पर पहुंच चुका है। कोरोना के कहर ने साल 1918 में फैले महामारी की याद दिला दी है। आपको जानकर हैरानी हो सकती है कि बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक उस महामारी से पांच से 10 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी। प्रथम विश्वयुद्ध के बाद जब दुनिया हालात से उबरने की कोशिश कर रही थी, उस वक्त यह महामारी दुनियाभर के लोगों पर कहर बनकर टूटी थी। इसे मानव इतिहास की सबसे भीषण महामारियों में से एक माना जाता है। आइए, जानते हैं इस बारे में विस्तार से:
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100 साल पहले फैली थी यह खतरनाक बीमारी
- फोटो : Social media
प्रथम विश्वयुद्ध के बाद 'स्पेनिश फ्लू' नाम की यह महामारी पश्चिमी मोर्चे पर स्थित छोटे और भीड़ वाले सैन्य प्रशिक्षण शिविरों से शुरु हुई। ऐसा बताया जाता है कि खासतौर पर फ्रांस की सीमा के करीब की खंदकों में गंदगी की वजह से ये बीमारी शुरू हुई और फैलती चली गई। विश्वयुद्ध नवंबर 1918 में खत्म हो चुका था, लेकिन घर वापस लौटने वाले संक्रमित सैनिकों के साथ यह वायरस अन्य क्षेत्रों में फैलता गया।
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100 साल पहले फैली थी यह खतरनाक बीमारी
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इस स्पेनिश फ्लू ने भारत में भी तांडव मचाया था। बताया जाता है कि उस समय देश में 14 लाख लोगों की इस बीमारी की चपेट में आकर मौत हुई थी। उस समय ज्यादा भीड़भाड़ वाले शहर मुंबई(तत्कालीन बंबई) में इसका सबसे ज्यादा असर देखने को मिला था। इस महामारी की चपेट में आए लोगों को बुखार, आंखों में चुभन, मांसपेशियों और हड्डियों में दर्द जैसी शिकायत थी।
कुछ ही दिनों में मुंबई में बहुत सारे लोगों की मौत होने लगी। रेलवे में सफर के जरिए यह फ्लू देश के दूसरे हिस्सों में भी फैलता चला गया है। हालांकि गांवों और कस्बों की तुलना में ज्यादातर यह शहरी क्षेत्रों में फैला। बताया जाता है कि भारत में 10 से 25 लाख लोग इस गंभीर फ्लू से प्रभावित हुए।
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इस महामारी का केंद्र स्पेन था, इसलिए इसे स्पेनिश फ्लू नाम दिया गया। स्पेन के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस में इस फ्लू ने ज्यादा तबाही मचाई थी। लौरा स्पिननी ने 'द गार्जियन' के एक हालिया लेख में बताया था कि मीडिया के जरिए पहले इसे छिपाया गया, जिससे इसे संभाला जा सके। हालांकि स्पेन ने प्रेस को सेंसर नहीं किया और इसकी रिपोर्ट सबसे पहले स्पेन में ही प्रकाशित की गई। इस कारण भी इसे स्पेनिश फ्लू कहा जाने लगा, जबकि ब्राजील में इसे जर्मन फ्लू तो सेनेगल में इसे ब्राजीलियन फ्लू कहा गया।