'सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
'दुष्यंत कुमार' की इन पंक्तियों को सुनकर हम सभी बड़े हुए हैं लेकिन कभी इस पर अमल करने की कोशिश तक नहीं की। वहीं मुंबई के एक स्लम में रहने वाली 'आरती नाइक' ने दुष्यंत कुमार की इन पंक्तियों को सही साबित कर दिया क्योंकि शर्त थी खुद से कि ये सूरत बदलनी चाहिए।
10वीं फेल लड़की ने कर दिखाया कमाल, क्योंकि शर्त थी खुद से कि ये सूरत बदलनी चाहिए
ये लड़की 10वीं फेल होकर भी आज बदल रही है दूसरी लड़कियों की जिंदगी
मुंबई के पास के एक स्लम मुलुंद में आरती का जन्म हुआ। जन्म के साथ ही गरीबी ने अपनी बाहों में लपेट लिया था। हर दिन की जिंदगी एक संघर्ष थी फिर पढ़ाई लिखाई तो दूर के खेत की मूली थी। गरीबी, घर में अच्छा गाइडेंस न मिलना और स्कूल में ठीक से पढ़ाई न होने की वजह से आरती 10वीं में फेल हो गईं थीं।
ये लड़की 10वीं फेल होकर भी आज बदल रही है दूसरी लड़कियों की जिंदगी
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। किसी ने सही कहा है, अकादमिक रिजल्ट जिंदगी में हमारी हार-जीत तय नहीं करतीं। आरती को आगे पढ़ना था लेकिन परिवार वालों के हाथ गरीबी ने खड़े करवा दिए। अब वक्त था कमान खुद के हाथों में लेने का और आरती ने वही किया। घर पर ही बैठ कर ज्वैलरी बनाने का काम शुरू कर दिया और पढ़ाई भी जारी रखी। इस दौरान आरती ने न सिर्फ अपनी 10वीं की पढ़ाई पूरी की बल्कि अगले और भी कई सालों तक मेहनत की। इसी बीच आरती ने खुद का दाखिला यशवंतराव चौहान महाराष्ट्र ओपन यूनिवर्सिटी के सोसियोलॉजी विभाग में करवा लिया।
ये लड़की 10वीं फेल होकर भी आज बदल रही है दूसरी लड़कियों की जिंदगी
इस दौरान आरती को ये ख्याल आया कि मैनें अपनी पढ़ाई तो पूरी कर ली लेकिन मेरी जैसी न जाने कितनी लड़कियां हैं जो स्लम में रहती हैं और उनको भी इसी तरह की परेशानी होती होगी। यहीं से उन्होंने फैसला किया कि अब और दूसरी स्लम के लड़कियों की जिंदगी बदलनी है। इस प्रण के साथ साल 2008 में 'सखी फोर गर्ल एजुकेशन' की शुरुआत हुई जो कि स्लम की लड़कियों को पढ़ाने का काम करती है।
शुरुआती दिन आसान नहीं थे। आरती ने जब मुंबई के अपने घर से सखी की शुरुआत की तब कुल जमा 6 बच्चे ऐसे थे जिनके मां बाप ने उन्हें पढ़ने को भेजा। हालांकि 3 महीने के बाद बच्चों की संख्या बढ़ने लगी। लोग अपने बच्चों को आरती के पास भेजने लगे। तिसरे महीने के बाद बच्चों की संख्या 23 तक हो गई। आरती अपने सेंटर पर बच्चों को ज्यादातर भाषा और गणित सिखातीं हैं क्योंकि आगे जा कर स्लम के बच्चों को यही परेशानी आती है।
ये लड़की 10वीं फेल होकर भी आज बदल रही है दूसरी लड़कियों की जिंदगी
फिर धीरे-धीरे देश ही नहीं विदेशों से भी मदद मिलने लगी। लोंगों की मदद और प्रोत्साहन के बाद आरती आज अपने सेंटर पर एक अंग्रेजी की लाईब्रेरी भी चलाती हैं। इसके अलावा वो सखी की पहुंच ज्यादा से ज्यादा लोगों तक बनाने के लिए अब स्लम के बच्चों के घर तक भी किताबें पहुंचाती हैं और जरूरत पड़ने पर क्लास भी देती हैं।
आरती की लड़ाई अभी लंबी है और उनके इरादे उतने ही मजबूत जिसके सामने बड़े-बड़े चट्टान भी ढेर हो जाएं फिर ये तो बदलाव की लड़ाई है। ये तो जीतना ही है।
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