पौ फटने को है और एक बड़े हाते में दो लोग नारंगी कपड़े से ढँके एक बक्से को किसी कोठरी से निकाल रहे हैं। कपड़ा हटने पर पता चलता है कि दरअसल ये एक दान-पात्र है जिस पर रात को 'चोरों' के डर से ताला लगा दिया जाता है। दान-पात्र सहेजने वालों में प्रांगण के 'सुरक्षाकर्मी' 3,000 रुपए प्रति माह की सैलरी पाने वाले हनुमान यादव भी हैं जो पिछले 20 सालों से यही काम कर रहे हैं।
पर्यटकों में होड़
घड़ी में सात बज चुके हैं और बाहर गेट पर पांच टेम्पो गहरा काला धुआं उगलते हुए रुके हैं। करीब 20 से ज्यादा महिला-पुरुष भीतर दाखिल होते हैं। होड़ शीशे में रखे एक ढाँचे को करीब से छूने की है। किसी ने माथा टेका, किसी ने सौ का पत्ता चढ़ाया और किसी ने सेल्फी ले डाली।
अयोध्या के बीचोबीच ये मंजर है राम जन्मभूमि न्यास कार्यशाला का जहाँ 1992 से पत्थरों को तराशने का काम जारी है। जिस ढाँचे को देखने और फोटो खींचने की होड़ मची रहती है वो प्रस्तावित राम मंदिर का एक ढांचा है। बगल के एक पत्थर पर लिखा है कि इसकी लंबाई 268 फीट, चौड़ाई 140 फीट और ऊँचाई 128 फीट होगी।
गुजरात के शिल्पकार
पिछले 24 से ज्यादा वर्षों के दौरान प्रस्तावित राम मंदिर के निर्माण के लिए तराशे जाने वाले पत्थर राजस्थान के भरतपुर से आए हैं। इस काम में जो दो प्रमुख शिल्पकार जुटे हुए हैं वे दोनों गुजरात के हैं हालांकि कार्यशाला के प्रमुख शिल्पकार ने बताया कि प्रस्तावित मंदिरों के लिए पत्थरों की भारी कमी है।
1992 में विवादित बाबरी मस्जिद ढांचा गिराया गया था और उसके बाद से गिरीश भाई सोमपुरा अपने परिवार के साथ यहाँ पहुंच गए थे। इन दिनों गिरीश भाई की तनख्वाह 12,000 रुपए महीने है, दो बेटियों और बेटे की शादी हो चुकी है और वे सभी गुजरात लौट चुके हैं।