फ्रांस से उड़ान भरकर भारत के लिए रवाना हुए पांच राफेल लड़ाकू विमानों का पहला जत्था बुधवार को अंबाला एयरबेस पर पहुंच जाएगा। भारत और फ्रांस के बीच 36 राफेल लड़ाकू विमानों के लिए सितंबर 2016 में करीब 60 हजार करोड़ रुपये का सौदा हुआ था।
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दुश्मनों का 'काल' राफेल के वायुसेना में शामिल होने से कैसी बढ़ेगी इसकी ताकत, यहां पढ़ें
Wed, 29 Jul 2020 12:18 PM IST
अनवर अंसारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अनवर अंसारी
Updated Wed, 29 Jul 2020 12:18 PM IST
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Rafale Jets
- फोटो : दसां एविएशन
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राफेल विमान
- फोटो : स्पेशल अरेंजमेंट
- राफेल 4.5 जनरेशन वाला लड़ाकू विमान है और इसकी रडार से बचने की काबिलियत दुश्मन के लिए खतरे की घंटी है। राफेल वायुसेना के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बेड़े के अधिकतर लड़ाकू विमान तीसरी या चौथी जनरेशन के हैं। इनमें मिराज 2000 और एसयू-30 एमकेआई जैसे लड़ाकू विमान शामिल हैं।
- राफेल एक ट्विन-जेट लड़ाकू विमान है, जिसे एक विमान वाहक और एक किनारे वाले बेस दोनों से संचालित किया जा सकता है। इसे बनाने वाली कंपनी दसां एविएशन ने इसकी खूबियों को लेकर बताया है कि ये लड़ाकू विमान सभी प्रकार के हवाई मिशन को अंजाम दे सकता है। निर्माताओं का कहना है कि ये लड़ाकू विमान वायु रक्षा, दूरी तक निशाना लगाने, टोह लेने और जहाजों को तबाह करने में सक्षम है।
- भारत के लिए जिन राफेल विमानों को तैयार किया गया है, उनका टेल नंबर आरबी-01 है, जो भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल आरकेएस भदौरिया का प्रारंभिक नाम है। वायुसेना प्रमुख भदौरिया ने भारत के इस सबसे बड़े सैन्य सौदे को करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
Rafale Jet
- फोटो : दसां एविएशन
- भारत ने 36 राफेल विमानों के लिए फ्रांस के साथ सितंबर 2016 में करीब 60 हजार करोड़ रुपये का सौदा किया था। 36 राफेल विमानों में से 30 लड़ाकू विमान होंगे और बाकी छह विमानों का प्रयोग ट्रेनिंग के लिए किया जाएगा। ट्रेनर विमानों में दो सीट होगी और इसमें लगभग वो सभी फीचर्स होंगे जो आम राफेल विमान में होते हैं।
- राफेल विमान के भारत आने से वायुसेना के मध्यम बहु-भूमिका वाले लड़ाकू विमान के बेड़े में एक महत्वपूर्ण वृद्धि होगी और इससे दुश्मन को जरूरत पड़ने पर कड़ा सबक सिखाया जा सकेगा।
- राफेल लड़ाकू विमानों को खासतौर पर भारतीय वायुसेना के लिए तैयार किया गया है। इसमें भारतीय परिस्थितयों को ध्यान में रखते हुए हेल्मेट माउंटेड साइट, रडार चेतावनी रिसीवर, फ्लाइट डाटा रिकॉर्डर, इंफ्रारेड सर्च और ट्रैक सिस्टम, जैमर, उच्च ऊंचाई वाले ठिकानों से संचालन के लिए कोल्ड इंजन जैसे फीचर्स लगाए गए हैं।
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राफेल विमान में भरा गया ईंधन
- फोटो : ANI
- राफेल लड़ाकू विमान रूसी सुखोई-30 लड़ाकू विमानों के बाद 22 वर्षों में पहली बार भारतीय वायुसेना में शामिल होने वाले आयातित लड़ाकू विमान होंगे। बता दें कि, सुखोई-30 को जून 1997 में भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया था।
- राफेल विमान वायुसेना के 17वें स्कवाड्रन का हिस्सा होगा, जिसे 'गोल्डन एरोज' के नाम से भी जाना जाता है। राफेल के पहले स्कवाड्रन को वायुसेना के सबसे रणनीतिक रूप से स्थित ठिकानों में से एक माने जाने वाले अंबाला एयरबेस पर तैनात किया जाएगा। राफेल के दूसरे स्कवाड्रन को पश्चिम बंगाल के हसीमारा एयरबेस पर तैनात किया जाएगा।
- वायुसेना ने इन दो एयरबेस पर शेल्टर, हैंगर्स और रखरखाव सुविधाओं जैसे बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए लगभग 400 करोड़ रुपये खर्च किए।
यह भी पढ़ें: अंबाला में राफेल की तैनाती ही नहीं, कलपुर्जे और उपकरणों का हो सकता है निर्माण
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Rafale Jets
- फोटो : दसां एविएशन
- फ्रांस, मिस्र और कतर के बाद भारत चौथा ऐसा देश होगा, जिसकी वायुसेना में राफेल लड़ाकू विमान शामिल होने जा रहा है।
- राफेल सौदे को वायुसेना का लड़ाकू क्षमताओं में आ रही कमी को ध्यान में रखते हुए किया गया था। बता दें कि, चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़ने के लिए 42 से ज्यादा यूनिट्स की जरूरत पड़ सकती है, लेकिन वायुसेना की यूनिट्स घटकर 31 हो गई थी।