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देखिए, हमें कैसे घेर लेता है मोटापा, कैसे पाएं छुटकारा?

Sun, 19 Feb 2017 06:04 PM IST
बीबीसी
बीबीसी Updated Sun, 19 Feb 2017 06:04 PM IST
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obesity can cause by  metabolism
आमतौर पर माना जाता है कि मेटाबॉलिज्म के घटने-बढ़ने से हमारा वजन भी घटता-बढ़ता है। अधिक वजन के लिए धीमे मेटाबॉलिज्म को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। साथ ही, यह भी माना जाता है कि खान-पान और कसरत से मेटाबॉलिज्म को नियंत्रित किया जा सकता है। लेकिन मामला इतना सीधा नहीं है जितना दिखता है। बीबीसी ने एक प्रयोग के जरिए ये जानने की कोशिश की है कि क्या मेटाबॉलिज्म को तेज किया जा सकता है, और इस पर खान-पान और कसरत का क्या असर होता है।

मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ा तो घेर लेगा मोटापा

obesity can cause by  metabolism

मेटाबॉलिज्म का मतलब
सबसे पहले जानते हैं मेटाबॉलिज्म क्या है। जब भी मेटाबॉलिज्म की बात होती है तो अक्सर हमारा मतलब 'आराम के समय मेटाबॉलिज्म' से होता है। आराम के समय हमारे शरीर की कोशिकाओं में कई तरह की रसायनिक गतिविधियां होती रहती हैं। जैसे कि पाचन (भोजन को ऊर्जा में बदलना), श्वसन और एक कोशिका से दूसरी कोशिका में पदार्थों की आवाजाही। इनके बिना हमारा जिंदा रहना संभव नहीं। शरीर की कोशिकाओं में हो रही इन रासायनिक गतिविधियों के लिए जितनी ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है, उसकी न्यूनतम मात्रा ही मेटाबॉलिज्म है।

इन गतिविधियों यानी मेटाबॉलिज्म में हमारा शरीर रोज जितनी भी ऊर्जा लेता है उसका 50 से 70 फीसदी खर्च होता है। मेटाबॉलिज्म के सुस्त पड़ने से मोटापा, थकावट, डायबीटीज, अधिक बीपी की संभावना बढ़ जाती है। आराम के समय मेटाबॉलिज्म पर कई चीजों का असर पड़ता है। इनमें उम्र, सक्रियता और कद अहम हैं। मेटाबॉलिज्म का स्तर अलग अलग लोगों में अलग अलग होता है। इसलिए कुछ लोगों में यह तेज होता है तो कुछ में धीमा। माना जाता है सीलिए हमारे मोटापे या दुबलेपन पर इसका कोई खास असर नहीं होता। तो देखते हैं कि मेटाबॉलिज्म को यदि तेज किया जाए तो क्या ये फायदेमंद हो सकता है। और क्या लगातार कुछ अतिरिक्त कैलोरी खर्च करके वजन को काबू किया जा सकता है?

मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ा तो घेर लेगा मोटापा

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बीबीसी का प्रयोग

बीबीसी ने पता लगाने की कोशिश की कि क्या खाने-पीने का और कसरत का शरीर के मेटाबॉलिज्म के घटने-बढ़ने पर कोई असर पड़ता है। इसके लिए बीबीसी ने 'मेरा विश्वास करें, मैं डॉक्टर हूं' नाम का एक कार्यक्रम शुरू किया है। कार्यकम के तहत एक प्रयोग किया गया। इसमें 8 हफ्तों के लिए 28 वॉलंटियरों को लिया गया और उन्हें तीन समूह में बांटा गया। पहले समूह को हर दिन फ्रिज का ठंडा, 5 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान वाला, पानी पीने को दिया गया। इसके पीछे सोच ये थी कि जब हम ठंडा पानी पीते हैं तो शरीर में थर्मोजेनेसिस प्रक्रिया शुरू होती है। यानी शरीर को अपना तापमान बढ़ाने के लिए अधिक ऊर्जा लगानी पड़ती है। यानी मेटाबॉलिज्म बढ़ता है।
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मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ा तो घेर लेगा मोटापा

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ऊर्जा की ज़रूरत


दूसरे समूह को दिन भर में चार बार डिकैफिनेटेड ग्रीन टी पिलाई गई। ग्रीन टी में कैटेचिन नाम का कुदरती रसायन होता है। माना जाता है कि यह मेटाबॉलिज्म को बढ़ाता है और इससे चर्बी कम होती है। तो तीसरे समूह से कई तरह की कसरतें करवाई गईं। कसरत से मांसपेशियां सक्रिय होती हैं, मजबूत होती हैं जिससे चर्बी कम करने में मदद मिलती है। मांसपेशियों के ऊतकों को वसा ऊतकों की तुलना में खुद को बनाए रखने के लिए अधिक ऊर्जा की जरूरत होती है। इससे जब आप आराम कर रहे होते हैं तब मेटाबॉलिज्म बढ़ता है।

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मेटाबॉलिज्म सुस्त पड़ा तो घेर लेगा मोटापा

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नतीजा क्या रहा

पहले दोनों समूहों में कुछ लोगों का वजन जरा सा कम हुआ। लेकिन मेटाबॉलिज्म पर असर नहीं हुआ।कुछ लोगों में बदलाव आया भी तो वो इतना मामूली था कि ठंडे पानी या ग्रीन टी का कोई खास असर नहीं हुआ। ठंडा पानी या ग्रीन टी जैसे पेय के साथ कई दूसरे अध्ययनों का भी यही नतीजा रहा। जहां तक तीसरे समूह की बात करें तो, 9 में से 7 लोगों की मांसपेशियां सक्रिय हुईं। इससे लंबी अवधि में शरीर और मेटाबॉलिजम में बदलाव आने की उम्मीद बंधी।
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