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शास्त्री जी B'DaySpecial: धरती के लाल ने दहेज में लिया था चरखा और खादी....
टीम डिजिटल / अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Sun, 02 Oct 2016 10:51 PM IST
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लाल बहादुर शास्त्री
- फोटो : getty
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'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का आज जन्मदिन है। देशभक्ति और ईमानदारी का प्रतीक माने जाने वाले शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। शास्त्री जी ने अपने विचारों और सादगी के जरिए देशवासियों के मन में अमिट छाप छोड़ी। उन्हें आज भी देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है। 1966 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। आईए उनके 116वें जन्मदिन के अवसर पर जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें...
शास्त्री जी B'DaySpecial: धरती के लाल ने दहेज में लिया था चरखा और खादी....
लाल बहादुर शास्त्री
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गरीबी में बीता बचपन
शास्त्री जी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब वह केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी मां अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं। वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर स्कूल जाते थे। यहां तक कि भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था। उनके पास नदी पार करने के लिए पैसे नहीं होते थे तो वह तैरकर गंगा नदी पार करते और स्कूल जाते थे।
शास्त्री जी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब वह केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी मां अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं। वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर स्कूल जाते थे। यहां तक कि भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था। उनके पास नदी पार करने के लिए पैसे नहीं होते थे तो वह तैरकर गंगा नदी पार करते और स्कूल जाते थे।
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लाल बहादुर शास्त्री
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बदल ली थी अपनी जाति
कायस्थ परिवार में जन्में लाल बहादुर शास्त्री के बचपन का नाम नन्हे था। बड़े होने पर इन्हें लाल बहादुर शास्त्री के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद काशी विद्यापीठ से उन्होंने 'शास्त्री' की उपाधि हासिल की और अपने उपनाम श्रीवास्तव को हटाकर शास्त्री कर लिया।
कायस्थ परिवार में जन्में लाल बहादुर शास्त्री के बचपन का नाम नन्हे था। बड़े होने पर इन्हें लाल बहादुर शास्त्री के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद काशी विद्यापीठ से उन्होंने 'शास्त्री' की उपाधि हासिल की और अपने उपनाम श्रीवास्तव को हटाकर शास्त्री कर लिया।
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लाल बहादुर शास्त्री
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बचपन से थे देश प्रेमी
बचपन से ही शास्त्री जी के अंदर देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से वे अत्यंत प्रभावित हुए। जब वह केवल ग्यारह वर्ष के थे तभी से आजादी के आंदोलनों में शामिल होते रहे। गांधी जी के आह्वान पर इन्होंने 1921 के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसके बाद 1930 में हुई दांडी यात्रा और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी अग्रिणी भूमिका निभाई। देशभक्ति की भावना से लबरेज शास्त्री जी को इस संघर्ष में कई बार जेल भी जाना पड़ा।
बचपन से ही शास्त्री जी के अंदर देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से वे अत्यंत प्रभावित हुए। जब वह केवल ग्यारह वर्ष के थे तभी से आजादी के आंदोलनों में शामिल होते रहे। गांधी जी के आह्वान पर इन्होंने 1921 के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसके बाद 1930 में हुई दांडी यात्रा और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी अग्रिणी भूमिका निभाई। देशभक्ति की भावना से लबरेज शास्त्री जी को इस संघर्ष में कई बार जेल भी जाना पड़ा।
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लाल बहादुर शास्त्री
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गांधी जी के आहवान पर छोड़ दी थी पढ़ाई
गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था। उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ थे।
गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था। उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ थे।