कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने पार्टी छोड़ दी है। आजाद ने पांच पेज का इस्तीफा कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेज दिया है। कांग्रेस से अलग होते ही आजाद ने एलान कर दिया कि वह अब एक नई राजनीतिक पार्टी बनाएंगे।
जम्मू कश्मीर में आने वाले कुछ समय में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में गुलाम नबी आजाद का कांग्रेस से अलग होकर नई पार्टी बनाना काफई दिलचस्प हो सकता है। गुलाम नबी आजाद अब आगे क्या-क्या कर सकते हैं? कांग्रेस के लिए किस तरह से मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं? भाजपा की इसमें क्या भूमिका हो सकती है? कश्मीर की राजनीति में क्या बदलेगा? आइए जानते हैं...
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गुलाम नबी आजाद, राहुल गांधी और सोनिया गांधी।
- फोटो : अमर उजाला
नई पार्टी बनाने के बाद आजाद के सामने कितने विकल्प?
यही सवाल हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से पूछा। उन्होंने कहा, 'गुलाम नबी आजाद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिश्ते काफी मधुर हैं। भाजपा के कई दूसरे नेताओं से भी उनकी नजदीकी है। ऐसे में यह संभव है कि वह आने वाले समय में भाजपा के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर का चुनाव लड़ें। आजाद के सामने नई पार्टी बनाने के बाद तीन विकल्प होंगे।'
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पीएम मोदी के साथ गुलाम नबी आजाद
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1. भाजपा गठबंधन के साथ चुनाव लड़ें: गुलाम नबी आजाद नई पार्टी बनाने के बाद जम्मू कश्मीर में पहला चुनाव लड़ेंगे। ऐसा संभव है कि वह इस संभावित चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर लें। भाजपा की स्थिति जम्मू की विधानसभा सीटों पर अच्छी है, लेकिन कश्मीर की सीटों पर ठीक नहीं है। आजाद के साथ आने पर भाजपा को कश्मीर में फायदा मिल सकता है।
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गुलाम नबी आजाद और पीएम मोदी।
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2. चुनाव के बाद भी गठबंधन के आसार: घाटी में भाजपा की स्थिति ठीक नहीं है। भाजपा का काफी विरोध होता है। ऐसे में यह भी संभावना है कि गुलाम नबी आजाद की नई पार्टी और भाजपा दोनों अलग-अलग चुनाव लड़ें। अगर चुनाव के बाद गठबंधन की स्थिति बनती है और गुलाब नबी आजाद इस स्थिति में होते हैं कि उनके साथ आने से भाजपा सरकार बना ले तो चुनाव के बाद भी दोनों के बीच गठबंधन की सकता है।
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गुपकार में भी शामिल हो सकते हैं आजाद
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3. गुपकार का साथ पकड़ेंगे आजाद?: जम्मू कश्मीर में भाजपा को मात देने के लिए सभी क्षेत्रीय दल एकसाथ आ गए हैं। इनमें फारुक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस, महबूबा मुफ्ती की पीडीपी जैसी बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां भी शामिल हैं। ऐसे में हो सकता है कि गुलाम नबी आजाद भी इसका हिस्सा बन जाएं।
ऐसा करके वह जम्मू कश्मीर के मुसलमान वोटर्स का साथ भी पा लेंगे। हालांकि, ऐसे में आजाद को ज्यादा महत्व मिलने की संभावना कम है। ऐसा इसलिए क्योंकि पीडीपी और नेशनल कांफ्रेंस जैसी पार्टियां सीट बंटवारे को लेकर पहले से ही भिड़ती रहीं हैं। इस स्थिति में किसी और पार्टी को जगह देना दोनों के लिए मुश्किल होने वाला है।