कलश पूजा के साथ ही बुधवार को नवरात्र की शुरुआत हो गई। राजधानी के विभिन्न इलाकों में माताओं के दरबार सज चुके हैं। अलसुबह से मंदिरों में घंटे-घड़ियाल की गूंज से माहौल भक्तिमय हो गया है। इस बार शारदीय नवरात्र 18 अक्टूबर तक होंगे। नवरात्र आद्य शक्ति की आराधना का सर्वश्रेष्ठ समय माना गया है। इन नौ दिनों में मां दुर्गा के शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री के रूपों की पूजा-अर्चना होगी।
जानकारी के अनुसार पहले नवरात्र पर प्रतिपदा के दिन घट स्थापना का विधान है। इस बार घट स्थापना का शुभ समय प्रात: 6:54 से लेकर 9:23 बजे तक है। वेस्ट गोरख पार्क स्थित राजमाता झंडे वाले मंदिर के महाराज स्वामी राजेश्वरानंद ने बताया कि नवरात्र के लिए मंदिर में विशेष तैयारियां की गई है। इन दिनों में मंदिर में श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ जाती है। मंदिर में सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं।
कालकाजी मंदिर के महंत सुरेंद्र नाथ अवधूत ने बताया कि मां कालका के दर्शन के लिए लाखों श्रद्घालु आते है। ऐसे में उनकी सुविधा के लिए पर्याप्त प्रबंध व सुरक्षा व्यवस्था की गई है। वहीं, झंडेवालान मंदिर में भी भक्तों की सुविधा के लिए विशेष प्रबंध किए गए है। उन्होंने बताया कि नवरात्र में दो साल से लेकर दस साल तक की कन्याओं के पूजन का विधान है। इस अवधि में दुर्गा सप्तशती का पाठ विशेष रूप से फलदायी माना गया है।
विक्रम संवत् 2075 प्रतिपदा दिन बुधवार शारदीय नवरात्र व्रत का प्रथम दिन है। शारदीय नवरात्र की प्रथम आराध्या देवी मां शैलपुत्री हैं। माता का यह रूप अनेकानेक नामों से लोक प्रसिद्ध है। सती, पार्वती, दुर्गा, उमा, अपर्णा, गौरी, महेश्वरी, शिवांगी, शुभांगी, पर्वतवासिनी। पूर्व जन्म में इनके पिता राजा दक्ष थे। राजा दक्ष ने प्रजेश होने पर यज्ञ किया।
समस्त परिजनों को आमंत्रित किया, पर अपने दामाद शिव को निमंत्रित नहीं किया। यज्ञ स्थल पर पहुंचने पर सती का तिरस्कार हुआ। अपमान से कुपित सती यज्ञाग्नि में कूद पड़ीं। शिव के निर्देश पर उनके वीरभद्र नामक गण ने यज्ञशाला का विध्वंस किया और सती के जलते शरीर को लेकर चल पड़ा। धरती पर सती के अंग जिस-जिस स्थान पर गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए। सती का अगला जन्म शैलराज की पुत्री पार्वती के रूप में हुआ।