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'मंटो' ने दर्शकों के दिलों-दिमाग पर किया गहरा असर, ये हैं फिल्म देखने की 7 सॉलिड वजह

Fri, 21 Sep 2018 09:47 AM IST
आनंद कश्यप
आनंद कश्यप Updated Fri, 21 Sep 2018 09:47 AM IST
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Film Review of Nawazuddin Siddiqui starrer film Manto biopic of Saadat Hasan Manto
फिल्म: मंटो

डायरेक्टर: नंदिता दास
स्टार कास्ट: नवाजुद्दीन सिद्दीकी ,रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन, ऋषि कपूर, दिव्या दत्ता, रणवीर शौरी, नीरज कबि, जावेद अख्तर
सर्टिफिकेट: U/A


अपने अफसानों (कहानियों) में मर्द-औरत के रिश्तों से समाज को इंसानियत की असली तस्वीर दिखाने वाले महान लेखक सआदत हसन मंटो जितने मशहूर थे उतने ही ‘बदनाम’ लेखक माने गए। मंटो को अपने अफसानों की वजह से जिंदगी के आखिरी समय परिवार के साथ मुफलिसी में बीताने पड़े। मंटो की इसी जिंदगी को अभिनेत्री और निर्देशक नंदिता दास ने फिल्म 'मंटो' की बयां किया है। फिल्म में मंटो की 'ठंडा गोश्त' और 'टोबा टेक सिंह' जैसी विवादित कहानियों का जिक्र दिखाया गया है। मंटो की इन कहानियों को भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के समय भी समाज के लिए श्राप माना गया था और देखा जाए तो आज के समय में भी भारत में जिस तरह के राजनीतिक पैमाने तय हो गए उसके हिसाब से भी मंटो के अफासने समाज के लिए एक बुराई हो सकते हैं।
Film Review of Nawazuddin Siddiqui starrer film Manto biopic of Saadat Hasan Manto
फिल्म 'मंटो' में सआदत हसन मंटो के किरदार में नजर आए नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने न केवल मंटो की उलझनों को बहुत ही बेहतरीन तरीके से परदे पर दिखाया बल्कि लेखक के तौर पर भी उन्होंने उस किरदार को आत्मसात किया है। फिल्म 'मंटो' की शुरुआत ऐसी नाबालिग लड़की के चित्रण से शुरू होती है जिसके साथ कुछ पल बीतने के लिए दो पुरुष उसके पिता को उस नाबलिग लड़की के समय की कीमत देते हैं। मंटो की भाषा में कहे तो यह वही औरत है जो खुद को बेच तो नहीं रही है लेकिन लोग उसको धीरे-धीरे खरीदते जा रहे हैं। फिल्म में ऐसी कई सीन हैं जो मंटो के अफसानों में धीरे-धीरे डुबाते जाते हैं। 
 
Film Review of Nawazuddin Siddiqui starrer film Manto biopic of Saadat Hasan Manto
मंटो के अफसानों में मर्द-औरत के रिश्तों के अलावा दूसरा जो आईना दिखता है वो बंटवारे के बाद बंबई (मुंबई) छोड़कर लाहौर जाना। इस दर्द को मंटो ने 'टोबा टेक सिंह' जैसी लघु कहानियाँ में बयां किया है। बंबई छोड़ने के बाद मंटो को दोस्त और बॉलीवुड कलाकार श्याम चड्ढा की दोस्ती का दर्द पूरी जिंदगी सताता रहा। आज की ही तरह उस समय में दोस्ती पर सांप्रदायिकता इतनी भारी पड़ी की मुस्लमान मंटो को अपने खास दोस्त श्याम चड्डा को छोड़कर हमेशा के लिए लौहार जाना पड़ा।
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फिल्म 'मंटो' लेखक सआदत हसन मंटो की जिंदगी के उन चार सालों के इर्द-गिर्द घूमती है जब भारत विभजन हुआ और करोड़ों हिंदू-मुस्लमान को विस्थापित होना पड़ा था। समाज के सांप्रदायिक नजरिए को देखते हुए मंटो की सोच थी- ‘मत कहिए कि हज़ारों हिंदू मारे गए या फिर हज़ारों मुसलमान मारे गए। सिर्फ ये कहिए कि हज़ारों इंसान मारे गए और ये भी इतनी बड़ी त्रासदी नहीं है कि हज़ारों लोग मारे गए। सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है कि हज़ारों लोग बेवजह मारे गए'
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बात करें फिल्म के किरदार की तो नवाजुद्दिन सिद्दीकी ने मंटो के किरदार के साथ पूरा न्याय किया है। वहीं उनकी पत्नी के किरदार में रसिका दुग्गल ने भी अच्छा काम किया है। फिल्म में मंटो के समय के लेखकों और शायरों इस्मत चुगताई और फैज अहमद फैज जैसी बड़ी शख्सियत को भी फिल्म 'मंटो' में दिखाया गया है। ताहिर राज भसीन, ऋषि कपूर, दिव्या दत्ता, रणवीर शौरी, नीरज कबि और जावेद अख्तर जैसे कलाकारों ने भी अपने अभिनय की छोटी-छोटी झलक दिखाकर फिल्म को और भी ज्यादा शानदार बनाए रखा।
 
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