Movie Review: छिछोरे
कलाकार: श्रद्धा कपूर, सुशांत सिंह राजपूत, वरुण शर्मा, ताहिर भसीन, तुषार पांडे, प्रतीक बब्बर, सहर्ष शुक्ला, नवीन पोलिशेट्टी, शिशिर शर्मा आदि।
निर्देशक: नितेश तिवारी
निर्माता: फॉक्स स्टार स्टूडियोज, साजिद नाडियाडवाला
स्टार: ***
हिंदी सिनेमा का कोई निर्माता इन दिनों अगर कोई फिल्म बनाकर इसे अपने बच्चों के लिए बनी सबसे अच्छी फिल्म बताकर गर्व महसूस करता है, तो मौजूदा दौर के लिए ये बड़ी बात है। साजिद नाडियाडवाला ने ढेरों फिल्में बनाई हैं लेकिन 'छिछोरे' उनकी फिल्मोग्राफी में एक सहज इजाफा भर नहीं है। यह फिल्म बताती है कि इंडियन फिल्म एंड टेलीविजन प्रोड्यूसर्स काउंसिल का ये चेयरमैन चाहे तो हिंदी सिनेमा की दशा और दिशा दोनों बदलने में बड़ी भूमिका निभा सकता है और यही इस फिल्म की जीत है। 'दंगल' के बाद बतौर निर्देशक नितेश तिवारी की ये अगली फिल्म है और वह अगर 'दंगल' से आगे का कुछ नहीं बना पाए तो उससे पीछे भी नहीं गए हैं।
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special screening of Chhichhore
- फोटो : amar ujala mumbai
नितेश तिवारी अपनी कहानियां खुद गढ़ते हैं। बाकी लोग भी उसमें खाद पानी डालते हैं उनका सिनेमा भारत की कहानी कहता है। इन कहानियों में एक आम इंसान की भावनाएं हैं। उसकी सोच है और सबसे बड़ी बात ये है कि इसमें कम से कम दो पीढ़ियों के बीच होने वाली बातचीत है, जो व्हाट्सऐप के चलते लगातार कम होती जा रही है। 'दंगल' में महावीर फोगट अपनी बेटियों के लिए परेशान है। यहां एक कामयाब बिजनेसमैन और उसके लंगोटिया यार अपने बेटे के लिए। कहानी की खटकने वाली बात ये है कि इतने पक्के दोस्तों ने आपस में जुड़े रहने के लिए कोई व्हाट्सऐप ग्रुप क्यों नहीं बनाया।
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chhichhore team
- फोटो : amar ujala
कहानी में झोल दो चार और भी हैं। कहानी है अन्नी, माया, सेक्सा, डेरेक, एसिड, मम्मी, वेबड़ा और रैगी की। इन मुख्य किरदारों के अलावा और भी तमाम किरदार हैं जो कहानी में रंग भरने आते जाते रहते हैं। कॉलेज में जूनियर्स और सीनियर्स का गैंग बनता है। हॉस्टलों के बीच चलने वाली अहम की लड़ाई सामने आती है। दो हॉस्टल एक दूसरे के सामने आ डटते हैं खेल के मैदान में। ये कहानी अतीत की है। वर्तमान में ये सारे दोस्त मिले हैं अन्नी यानी अनिरुद्ध पाठक के बेटे की जान बचाने के लिए। इम्तिहान में नाकाम रहने का दबाव न झेल पाए अन्नी के बेटे को इन दोस्तों की कहानी सुनकर जिंदगी समझ आती है।
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Chhichhore film on location picture
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
नितेश तिवारी ने 'दंगल' में भी वर्तमान और अतीत का पुल बनाया था। वहां मामला महावीर फोगट के अपने बेटियों के लिए मेडल जीतने का था। यहां कहानी ये बताती है कि जिंदगी में जीत और हार से ज्यादा बड़ी बात है, प्रतियोगिया या फिर संघर्ष में बने रहना। मन लगाकर कोशिश करना जरूरी है। 'थ्री ईडियट्स' की कहानी में भी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र के पंखे से कूद जाने का किस्सा है, यहां आईआईटी की प्रवेश परीक्षा पास न कर पाया बच्चा छत से छलांग लगा देता है। इस मायने में नितेश तिवारी चूके हैं। नितेश के निर्देशन की दूसरी दिक्कत यहां है अपने कौशल का अतिरिक्त प्रदर्शन। अस्पताल की घटनाओं और हॉस्टल की घटनाओं को वह मानवीय संवेदनाओं से जोड़ने की कोशिश करते हैं और यह फिल्म के कथ्य में कई बार खटकती हैं।
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Chhichhore
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नितेश ने अपनी कहानी के सारे पात्र बहुत सटीक चुने हैं। इसके लिए कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा ज्यादा तारीफ के हकदार हैं। यहां फिल्म का कोई एक हीरो नहीं है। सुशांत का किरदार सिर्फ कहानी का आधार है। श्रद्धा कपूर उस पर समय का पहिया चढ़ाती हैं लेकिन समय को आगे बढ़ाने वाली सुइयां बने हैं इसके बाकी कलाकार। वरुण शर्मा का किरदार हो या फिर मम्मी के नाम से पुकारे जाने वाले तुषार पांडे, दोनों की अदाकारी फिल्म की जान है। सहर्ष शुक्ला बेवड़ा के किरदार में प्रभावित करते हैं तो डेरेक बने ताहिर भसीन का काम भी लाजवाब है।