सीरीज के निर्देशक करण डी. कपाड़िया मानते हैं कि ऐसे विषय को पर्दे पर उतारने को लेकर डर लगता है। हालांकि, वो यह भी कहते हैं कि अगर बात सच की है, तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। अमर उजाला से बातचीत में करण ने महात्मा गांधी का जिक्र करते हुए कहा कि अकेले खड़े होने पर भी सच नहीं बदलता। उन्होंने अनीत पड्डा, फातिमा सना शेख और अपनी निर्देशन की सोच के पर भी बात की।
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अनीत पड्डा
- फोटो : इंस्टाग्राम@aneetpadda_
आपने कहा यह कहानी आपके लिए निजी है। ऐसा क्या है इसमें?
दरअसल, इस कहानी की शुरुआत करीब तीन साल पहले हुई थी। जब इसे सुना तो लगा कि इसमें कुछ ऐसा है, जिसे कहा जाना चाहिए। उसके बाद लिखाई शुरू हुई और 2024-25 में शूटिंग की। अब जाकर यह दर्शकों के सामने आ रही है। मेरे लिए यह कहानी बहुत करीब है। यह सिर्फ क्राइम की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे समाज में जो हो रहा है, उसकी भी झलक है।
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हुंकार
- फोटो : सोशल मीडिया
कहानी का विषय ऐसा है, जिस पर लोग खुलकर बात करने से कतराते हैं। क्या आपको भी डर लगा?
डर तो होता है, खासकर जब कहानी में एक प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु पर ऐसे गंभीर आरोप हों। लेकिन अगर आप सच बोल रहे हैं तो फिर डर के कारण पीछे नहीं हट सकते। गांधीजी की एक बात मुझे हमेशा याद रहती है- अगर आप सच बोल रहे हैं और उस वक्त अकेले भी खड़े हैं, तब भी सच, सच ही रहता है। अगर समाज में बदलाव चाहिए तो किसी को तो बोलना पड़ेगा।
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अनीत पड्डा
- फोटो : इंस्टाग्राम@aneetpadda_
जब आपने इस रोल के लिए अनीत पड्डा को चुना, तब ‘सैयारा’ रिलीज भी नहीं हुई थी। आपको अंदाजा था कि वह इतनी बड़ी स्टार बनेंगी?
नहीं, ‘सैयारा’ ने जो किया, उसकी हमने कल्पना भी नहीं की थी। मैंने नहीं सोचा था कि फिल्म इतना बड़ा करेगी और अनीत की इतनी बड़ी फैन फॉलोइंग बन जाएगी। लेकिन ‘हुंकार’ के वक्त अनीत को लेकर मेरे मन में कोई सवाल नहीं था। यह उनके साथ मेरा तीसरा काम है। मुझे उनकी क्षमता पता थी।
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हुंकार: द रोर टीजर
- फोटो : सोशल मीडिया
स्टार बनने के बाद अनीत में कोई बदलाव नजर आया?
स्टार होने की जिम्मेदारी आसान नहीं होती। लेकिन हमारे बीच जो रिश्ता है, उसमें वह आज भी वही अनीत हैं। हां, अभिनेता के तौर पर उनमें आत्मविश्वास और समझदारी आई है। बाकी वह पहले से बहुत प्रतिभाशाली थीं, इसमें कभी कोई शक नहीं था।