श्रीदेवी एक कुशल चित्रकार भी थीं। दुबई में चैरिटी के लिए उनकी पेंटिंग प्रदर्शनी में लगने वाली थी। जहां तक मुझे धुंधली-सी तस्वीर याद है, जब टीवी पर फिल्म 'शोले' आदि का रिपीट टेलीकास्ट या 'रामायण', 'महाभारत' सीरियल आए, तो मेरे घर में गली के लोगों का जमावड़ा लग जाता था। इन्हीं जमावड़ों में से लोगों के कौतूहल का कारण श्रीदेवी की 'नागिन' और 'निगाहें' जैसी फिल्में भी थीं जिसमें महिलाओं की संख्या तब ज्यादा होती थी। आखिर भीड़ हो भी क्यों न? परदे पर उन महिलाओं की प्यारी श्रीदेवी जो थीं।
दूसरी तरफ, स्कूल-कॉलेज जाने वाली लड़कियों में 'चांदनी', 'लम्हे', 'चालबाज' जैसी फिल्मों का ज्यादा क्रेज था। 'चांदनी' तो खासतौर से सभी वर्ग के लोगों में चर्चित रही। इसके गीत सबके जुबां पर आज भी हैं। ठीक इसी तरह बच्चों में साइंस फिक्शन वाली 'मिस्टर इंडिया' का जादू आज भी बरकरार है। 'हवा-हवाई' गाने के तो सिक्वल भी बनें। आज प्रशंसकों की 'हवाइयां' ही उड़ गई, एक बिजली गिरने जैसा ही लगा। सहसा यकीन नहीं होता कि लोगों के दिल पर जादू करने वाली सिने जगत की 'श्री' अब नहीं रहीं।
'करोगे याद तो हर बात याद आएगी', दरअसल ये जादू 'अम्मा यंगर अय्यप्पन उर्फ श्रीदेवी' का था, जो आधुनिक होती हिंदी सिनेमा का भी द्योतक बनीं। एक तरफ अमिताभ बच्चन, जीतेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती, रजनीकांत जैसे नायक सुपरस्टार थे, तो नायिका सुपरस्टार के तौर पर सामने थीं केवल श्रीदेवी। वैजयंती माला, वहीदा रहमान, हेमा मालिनी, रेखा जैसी अभिनेत्रियों की ये अगली कड़ी बनीं। फिल्मों में कुशल अभिनय के साथ-साथ पारंगत डांसर की परंपरा को श्रीदेवी ने बखूबी निभाया। न केवल निभाया ही वरन् आधुनिकता का पर्याय भी बनीं।
'चांदनी' के सलवार-सूट और लहरिया दुपट्टा का कॉम्बिनेशन पहन उस दौर की हर युवा लड़की अपने आप को श्रीदेवी की तरह ही दिखने की तमन्ना रखती थी। आज वह सभी महिलाएं जरूर 'मेरे हाथों में नौ-नौ चूड़ियां' और 'मैं ससुराल नहीं जाऊंगी' जैसे फिल्मी गीतों को शिद्दत से याद कर रही होंगी। महिलाएं ही क्यों? उस दौर के हर शख्स को 'सदमा' लगा होगा कि उनकी शोख-चुलबुली, खिलखिलाती 'चांदनी' की आवाज थम गई।