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के आसिफ की लगन से बनी थी 'मुगल-ए-आजम', शूटिंग में इस्तेमाल हुए थे असली मोती

Sun, 14 Jun 2020 08:45 PM IST
अपूर्वा राय अपूर्वा राय
अपूर्वा राय Published by: अपूर्वा राय Updated Sun, 14 Jun 2020 08:45 PM IST
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K Asif Mughal e Azam director Lesser Known Facts On His Birth Anniversary
के आसिफ - फोटो : social media

हिंदी सिनेमा के इतिहास में अगर किसी निर्देशक के बेहतरीन काम को याद किया जाएगा तो उसमें के. आसिफ का नाम जरूर शामिल होगा। के. आसिफ ने अपनी एक फिल्म से जो कुछ हासिल किया वो सैकड़ों फिल्में बनाने वाले निर्देशकों भी नसीब नहीं होता। के. आसिफ मुंबई दर्जी बनने आए थे लेकिन बन गए निर्देशक।



जब आसिफ मुंबई आए तो शुरू में तो उनके चाचा नजीर ने उन्हें फिल्मों में लाने की खूब कोशिश की लेकिन आसिफ का वहां मन न लगा। लेकिन कौन जानता था ये शख्स एक दिन अपनी एक फिल्म के लिए ही इतना मशहूर हो जाएगा।

K Asif Mughal e Azam director Lesser Known Facts On His Birth Anniversary
मुगल-ए-आजम - फोटो : सोशल मीडिया

के. आसिफ ने अपने जीवन में सिर्फ दो फिल्मों का निर्देशन किया 1944 में आई 'फूल' और फिर 'मुगल-ए-आजम।' आसिफ साहब ने इस फिल्म को जिस पागलपन से बनाया उसे बता पाना शायद संभव न हो। इस फिल्म को बनाने में 14 साल लगे। फिल्म के गानों पर पानी की तरह पैसा बहाया गया ताकि सब असली लग सके। खतीजा अकबर अपनी किताब 'द स्टोरी ऑफ मधुबाला' में लिखती हैं, "शीश महल का सेट जिसमें जब प्यार किया तो डरना क्या गाना फिल्माया गया था को बनने में पूरे दो साल लग गए।''

के आसिफ के बारे में फिल्म समीक्षक इकबाल रिजवी बताते हैं- फिल्म का एक दृश्य में सलीम को मोतियों पर चलकर महल में दाखिल होना था। इस सीन के लिए नकली मोती मंगवाए गए थे लेकिन के. आसिफ को इसमें असलियत दिखाई नहीं पड़ी।

K Asif Mughal e Azam director Lesser Known Facts On His Birth Anniversary
मुगल-ए-आजम - फोटो : सोशल मीडिया

उन्होंने फिल्म के फाइनेंसर शाहपुरजी मिस्त्री से 1 लाख रुपये मांगे। जब उन्होंने पूछा कि तुम्हे ये पैसे क्यों चाहिए तब के. आसिफ का जवाब था- मैं इस सीन के लिए असली मोती मंगवाना चाहता हूं। शाहपुरजी मिस्त्री गुस्से में बोले- तुम पागल हो गए हो क्या? तुम बनावटी मोती का इस्तेमाल भी तो कर सकते हो... इससे क्या फर्क पड़ेगा?

 तब के. आसिफ ने उनसे कहा- फर्क पड़ेगा...क्योंकि सच्चे मोती पर अगर कोई चलेगा तो उसके चेहरे के भाव नकली नहीं लगेंगे...मुझे इस फिल्म में सब कुछ असली चाहिए, दिखावटी कुछ भी नहीं। जब किसी को पहले से ही पता होगा कि ये नकली मोती है तो वो उसपर चलने पर वो भाव नहीं आएगा जिसे मैं अपनी फिल्म में दिखाना चाहता हूं।

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मुगल-ए-आजम - फोटो : Self

शाहपुरजी मिस्त्री गुस्से से तिलमिलाए चले गए। फिल्म की शूटिंग रोक दी गई। करीब 20 दिन के बाद ईद थी। शाहपुरजी मिस्त्री ने जब मुगल-ए-आजम के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया फिल्म की शूटिंग रुकी हुई है, अगर आप मोतियों का बंदोबस्त कर लें तो दोबारा फिल्म की शूटिंग शुरू हो जाएगी। इस बीच शाहपुरजी ये तक सोचने लगे थे कि इस फिल्म को के. आसिफ से लेकर सोहराब मोदी से निर्देशित करवाया जाए।

 शाहपुरजी मिस्त्री को के. आसिफ की ये ईमानदारी बहुत पसंद आई। हालांकि इस फिल्म पर पहले से ही बहुत खर्च किया जा चुका था लेकिन के. आसिफ की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और उन्होंने के. आसिफ को ईदी के तौर पर 1 लाख रुपये दिए। जिसका इस्तेमाल उन्होंने फिल्म के लिए असली मोती खरीदने में किया।

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के. आसिफ - फोटो : Self

पूरी फिल्म की शूटिंग के दौरान के. आसिफ और शाहपुरजी के बीच नोकझोक चलती रही। लेकिन शाहपुरजी को ये बात पता थी कि ये आदमी बहुत ईमानदार है। इसने इस फिल्म में डेढ़ करोड़ रुपए खर्च कर दिए हैं, लेकिन उसने अपनी जेब में एक फूटी कौड़ी भी नहीं डाली है। मुगल-ए-आजम अपने जमाने की सबसे मंहगी और सफल फिल्म थी, हालांकि रिलीज के समय ये फिल्म उतनी नहीं चली लेकिन बाद के वर्षों में इसे कल्ट फिल्म माना गया। निर्देशक के. आसिफ ताउम्र एक किराए के घर में रहे और टैक्सी पर चले। 9 मार्च 1971 को दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। आज के आसिफ की जयंती है। उनका जन्म आज ही के दिन इटावा में हुआ था।

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