मुंबई में न रहकर भी लगातार 20 साल तक हिंदी फिल्मों में काम करने का अगर मेडल दिया जाएगा, तो वह मुझे मिलेगा। मुझे यह मेडल दिलाने के जिम्मेदार होंगे तिग्मांशु धूलिया। पहला धारावाहिक उनकी वजह से मिला, पहली फिल्म उनकी वजह से मिली और यह भरोसा तथा हौसला भी उन्होंने ही दिया कि मुंबई में बेस बनाए बिना भी फिल्मी दुनिया में बने रहा जा सकता है। बात 1986 की है, तब मैं दिल्ली में रघुवीर सहाय जी के थियेटर ग्रुप ‘कौमुदि’ से जुड़ा था। उस समय तिग्मांशु धूलिया नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ रहे थे। एक दिन वे भी हमारा नाटक देखने आए। नाटक के बाद परिचय हुआ। उन्होंने बताया कि मैंने नाटक में अच्छा काम किया है। इसके बाद उनसे कभी कभार मुलाकातें हो जाया करती थीं।
जो कुछ भी हूं तिग्मांशु धूलिया की वजह से हूं, हमेशा इनका अहसानमंद रहूंगा: राजीव गुप्ता
1990 में शेखर कपूर की फिल्म ‘बैंडिट क्वीन’ के लिए तिग्मांशु धूलिया को कास्टिंग डायरेक्टर की जिम्मेदारी दी गई। एनएसडी और दिल्ली में नाटक करने वाले कई कलाकारों का उन्होंने चयन किया। मेरा चयन होते-होते रह गया। दरअसल, उन्हीं दिनो मैं शादी कर रहा था। हमारा प्रेम विवाह था, जिसमें घरवालों की रजामंदी नहीं थी। वे काफी तनाव के दिन थे और हालात के चलते मैं फिल्म की शूटिंग के लिए 45 दिन चंबल में नहीं रह सकता था।समय बीतता गया। 1998 में फिल्म ‘दिल से’ के संवाद लेखक के रूप में तिग्मांशु धूलिया दिल्ली आए। उन्होंने मुझसे पूछा कि मुंबई क्यों नहीं आ जाते? मैंने पारिवारिक जिम्मेदारियों का हवाला दिया, तो उन्होंने कहा कि अगर धैर्य से जुटे रहो, तो दिल्ली में रहकर भी फिल्में कर सकते हो।
यह महज इत्तेफाक था कि ‘दिल से’ में ड्राइवर का छोटा-सा रोल मेरे हिस्से में भी आ गया। इसके बाद साल 2000 में स्टार टीवी पर विजयदान देथा की कहानी पर ‘अनेकों हिटलर’ नाम का धारावाहिक बना। इसमें तिग्मांशु धूलिया ने मुझे भी एक रोल दिया। अगले साल उन्होंने स्टार प्लस के धारावाहिक ‘राजधानी’ के लिए मेरा चयन किया। इसके बाद उन्होंने फिल्म ‘मॉनसून वेडिंग’ में मुझे मौका दिलवाया। फिर एक दिन तिग्मांशु धूलिया ने अपने निर्देशन की पहली फिल्म ‘हासिल’ में मुझे मौका दिया। ‘हासिल’ की शूटिंग के दौरान इलाहाबाद में मुझे उनके साथ ढेर-सारा समय बिताने का मौका मिला। जब तक ‘हासिल’ रिलीज हुई, मुझे तिग्मांशु के रूप में एक आदर योग्य गुरु, दोस्त और एक बेहतरीन इंसान का साथ मिला। मेरे काम को पहचान मिली।
फिर तो तिग्मांशु धूलिया की हर फिल्म का मैं हिस्सा बनने लगा। उन्होंने ही सबसे पहली बार मेरी प्रतिभा पहचानी। उन्हें यह बात अच्छी लगती थी कि मैं अपनी घरेलू जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ फिल्मों में काम करने का शौक पूरा करने का हौसला रखता था। वे लगातार मुझे एहसास दिलाते रहे कि मैं अगर सिर्फ अभिनय करने का संतोष हासिल करना चाहता हूं, तो ग्लैमर की चकाचौंध से बचकर बिना मुंबई में आशियाना बनाए फिल्में कर सकता हूं। मैं आज तक यही कर रहा हूं। यह आसान काम नहीं है, मगर मैंने उनका विश्वास टूटने नहीं दिया है। तिग्मांशु धूलिया से करीब 20 साल के साथ के दौरान मैंने ‘पीके’, ‘जॉली एलएलबी’, ‘गुड्डू रंगीला’, ‘हमारी अधूरी कहानी’ और ‘मदारी’ सहित करीब 25 फिल्मों में अभिनय किया। इस दौरान तिग्मांशु धूलिया ने ही हॉलीवुड सिनेमा से मेरा गहरा परिचय कराया।
साहित्य से मेरा गहरा लगाव बना, चुटकुले और व्यंग्य का फर्क सीखा, संगीत को समझने की कोशिश की। दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों को एक सैलानी की तरह देखा और राजनीतिक समझ विकसित हुई। जिंदगी और दुनिया को देखने का नजरिया बदल गया। मेरे विचारों को विस्तार मिला। एमए, बीए तो लाखों लोग करते रहते हैं, लेकिन पढ़-लिखकर जो ज्ञान हासिल किया उसे निजी जीवन में भी जिया जाए, ऐसा बहुत कम लोग कर पाते हैं। तिग्मांशु ऐसे ही हैं, सहज, सरल, ज्ञानी और बेहतरीन इंसान और नए विचारों का स्वागत करने वाले एक विद्यार्थी।