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बिना इंटरनेट के भी भारी पड़े हैं ये किसान आंदोलन, राजीव सरकार को भी हिला डाला था

Sun, 31 Jan 2021 07:32 PM IST
Devesh Devesh एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला
एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: Devesh Devesh Updated Sun, 31 Jan 2021 07:32 PM IST
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kisan aandolan history farmer movement has overwhelmed even without internet, it also shook the Rajiv government.
rakesh tikait - फोटो : amar ujala

इन दिनों देशभर में एक आंदोलन की खूब चर्चा हो रही है। देश की राजधानी की सीमाओं पर चल रहा यह आंदोलन कोई सामान्य धरना-प्रदर्शन नहीं है। यह देश के मेहनतकश अन्नदाताओं का आंदोलन हैं, जो अपनी मांगों को मनवाने के लिए आंदोलनरत हैं। कई लोग इस आंदोलन के समर्थन में हैं तो कई लोग अराजक आंदोलन के खिलाफ हैं। आंदोलन और आंदोलन के तौर-तरीके ये लंबी बहस के विषय हैं। खैर, आज हम बात करेंगे देश के उन प्रमुख किसान आंदोलनों के बारे में, जिन दिनों देश में इंटरनेट सामान्य वर्ग के पास लगभग था ही नहीं लेकिन फिर भी सरकार पर भारी पड़े। 

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पोस्टरों पर लिखा नो फारमर नो फूड - फोटो : amar ujala

1947 :  तेलंगाना आंदोलन
तेलंगाना किसान आंदोलन छोटे स्तर पर 1946 में शुरू हो चुका था। लेकिन इसने जोर पकड़ा 1947 में। इस किसान आंदोलन में तत्कालीन ब्रिटिश शासन और आजाद भारत की पहली सरकार पर हल्का दबाव बनाने में कामयाब रहा। आंध्र प्रदेश में यह आंदोलन जमींदारों एवं साहूकारों की शोषणवादी नीतियों तथा भ्रष्ट अधिकारियों के अत्याचार के खिलाफ प्रारंभ किया गया था। तब कम कीमत पर गल्ला वसूली इस आंदोलन के पीछे मुख्य वजह थी। इस आंदोलन में किसान बिना किसी मध्यस्थ के स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़ने लगे थे। इनकी अधिकांश मांगें आर्थिक होती थीं। इस आंदोलन ने राजनीतिक शक्ति के अभाव में ब्रिटिश उपनिवेश का विरोध नहीं किया। इन किसानों की लड़ाई व्यवस्था-परिवर्तन नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था पर यथास्थिति बनाए रखना था। 

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kisan andolan - फोटो : अमर उजाला

1967 : जमीन विवाद से नक्सलबाड़ी आंदोलन
देश की आजादी के दो दशक और 1965 के युद्ध के बाद शुरू हुए इस आंदोलन ने देश के वंचित- शोषित तबके के लोगों को हथियारों के साथ संघर्ष करना सिखाया। किसानों के नाम पर शुरू हुआ यह आंदोलन देश में नक्सलवाद की मजबूत नींव रख गया। आंदोलन की शुरुआत एक किसान के जमीन विवाद से लेकर हुई है। तब बंगाल में जमींदारों के शोषण से पीड़ित बटाईदार परेशान थे। कम्युनिस्ट सरकार के दौरान किसान आंदोलन उफान पर था। इससे घबराए जमींदारों ने बटाईदारों को बेदखल करना शुरू कर दिया। जमींदार बिगुल नामक किसान को उसकी जमीन का कब्जा नहीं दे रहा था जबकि उसके पास अदालती आदेश भी था। तब सशस्त्र किसानों के जत्थों ने जमीनों पर कब्जा करना शुरू कर दिया।

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kisan aandolan history farmer movement has overwhelmed even without internet, it also shook the Rajiv government.
गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों का हुजूम - फोटो : अमर उजाला

1988 के आंदोलन ने हिला दी थी राजीव गांधी की सरकार 

किसानों के बीच बाबा टिकैत के नाम से लोकप्रिय किसान नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व वाला 1988 का किसान आंदोलन आजाद भारत का ऐसा बड़ा आंदोलन था, जिसने तत्कालीन केंद्र सरकार को हिला डाला था। देश के अन्नदाताओं के उस आंदोलन ने राजीव गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। महेंद्र सिंह टिकैत पांच लाख किसानों को लेकर एक सप्ताह तक दिल्ली के बोट क्लब पर बैठे रहे थे। इस आंदोलन ने तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी थी। इसमें 14 राज्यों के किसान शामिल हुए थे। तब किसानों के जत्थों ने विजय चौक से लेकर इंडिया गेट तक कब्जा जमा लिया था। किसान ट्रैक्टर और बैल गाड़ियां लेकर बोट क्लब पहुंच थे। इतना ही नहीं किसान तब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि के लिए बनाए जा रहे मंच पर बैठ गए थे। तब जाकर सरकार ने किसानों के 35 सूत्रीय मांगों पर अमल करने का आश्वासन दिया था। इसके बाद किसानों ने अपना आंदोलन खत्म कर दिया था। 

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