पहाड़ की वादियों का रेडियो से दिल का नाता रहा है। रेडियो की आवाज से यहां के लोगों ने खुद को देश-दुनिया से जोड़े रखा। उन दिनों जब कई जनपदों में बमुश्किल एक रेडियो होता था, तब मसूरी में ‘एमर्सन’ कंपनी के रेडियो एजेंट बनवारी लाल ‘बेदम’ रेडियो की आवाज को पहाड़ की चोटियों तक पहुंचा चुके थे। मीलों दूर से लोग उनके पास रेडियो खरीदने आते थे। खुद बनवारीलाल कई दिनों की पैदल यात्रा कर दूरदराज के क्षेत्रों में रेडियो पहुंचाते थे।
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हवा की चरखी से चलता था रेडियो
पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी बताते हैं कि उन दिनों रेडियो चलाना आसान नहीं था। एमर्सन कंपनी के रेडियो चलाने के लिए एक हवा की चरखी छत पर लगती थी। हवा चलने से बैटरी चार्ज होती थी और रेडियो चल पड़ता था। ऐसी चरखियों को देखकर राह चलते लोग हैरान हो जाते थे। रेडियो सुनने के लिए कतारें लगती थीं।
गोरखा समाज को नई दिशा दे रहा घाम छाया
पहाड़ों पर रेडियो की पहुंच आजादी से पहले ही हो गई थी। अब रेडियो में नए प्रयोग यहां की संस्कृति को संरक्षित कर रहे हैं। घाम-छाया 90.0 कम्युनिटी एवं डिजिटल रेडियो की शुरुआत भी ऐसा ही प्रयोग है। इस पर गोरखा इतिहास, भाषा एवं संस्कृति से जुड़े कार्यक्रम ब्राडकास्ट होते हैं। वहीं, मुक्तेश्वर के सूपी गांव से संचालित कम्युनिटी रेडियो स्टेशन भी अपनी संस्कृति को जीवित रखने के लिए प्रयासरत है। यह रेडियो स्टेशन कुमाऊंंनी को नई दिशा दे रहा है। सभी कार्यक्रम कुमाऊंंनी में प्रसारित किए जाते हैं।
मसूरी में रहता है ‘बेदम’ का परिवार
बनवारी लाल का परिवार अब भी मसूरी में रहता है। उनके पोते विनय कुमार गुप्ता वरिष्ठ अधिवक्ता हैं। बताते हैं कि उनके बाबा ने पहाड़ों पर रेडियो का विस्तार किया। उनमें रेडियो को लेकर जुनून था। टिहरी में गुलजारी लाल असवाल के रेडियो में खराबी आने पर उनके बाबा ने दस दिन वहीं रुककर रेडियो को ठीक किया था।
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यहीं से होती थी रेडियो की सप्लाई
शहर कांग्रेस अध्यक्ष गौरव अग्रवाल बताते हैं कि बनवारी लाल उनके रिश्तेदार थे। वर्तमान में उनके होटल में ही उनकी रोडियो की एजेंसी चलती थी। यहीं से रेडियो की सप्लाई होती थी।