चमोली की ऋषिगंगा में अचानक बाई बाढ़ और फिर उससे मची तबाही के वास्तविक कारणों को जानने के लिए कई एजेंसियां लगी हुई हैं। वैज्ञानिक शोध भी हो रहे हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि पर्यावरण नियमों को ताक पर रखकर कंपनियां यहां काम करती रही हैं। कंपनियां यहां भारी विस्फोट करतीं थीं और परियोजना निर्माण का मलबा भी ऋषिगंगा में ही डंप किया जाता था। इस कारण भी आपदा का रूप भयावह रहा।
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चमोली में आपदा के बाद का नजारा
- फोटो : अमर उजाला
ऋषिगंगा की आपदा में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 204 लोग लापता हुए, जिसमें अभी तक 58 शव बरामद हो चुके हैं। वहीं अन्य को तलाशने का काम भी जारी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि पर्यावरण के नियमों का पालन किया गया होता तो शायद यह आपदा नहीं आती। स्थानीय निवासी संग्राम सिंह सहित अन्य लोग कहते हैं कि ऋषिगंगा पावर प्रोजेक्ट और तपोवन जल विद्युत परियोजना का निर्माणदायी कंपनियों ने हर स्तर पर मानकों का उल्लंघन किया।
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चमोली में आपदा
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कंपनियां क्षेत्र में लगातार भारी विस्फोट करती थीं। परियोजना निर्माण में निकलने वाले मलबे को नदी में डंप किया गया। ग्रामीण कई बार इसके विरोध में आवाज उठा चुके हैं, लेकिन उनकी आवाज को दबा दिया गया। आज नतीजा सभी के सामने हैं।
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नदी में मलबा
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10 दिन पूर्व आई आपदा में मलबे के ढेर में ऋषि गंगा पावर प्रोजेक्ट का कुछ पता ही नहीं चल रहा था। अब यहां पर लोगों की तलाश में मलबा हटाने का काम चल रहा है, जिसके चलते धीरे-धीरे परियोजना के अवशेष नजर आ रहे हैं।
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आपदाग्रस्त क्षेत्र में भंडारा
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आपदा प्रभावित क्षेत्र तपोवन और रैणी क्षेत्र में आपदा के बाद से ही विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने पीड़ित परिवारों और बचाव कार्य में लगे कर्मियों के लिए भंडारे की व्यवस्था की थी। शुरुआत में यहां काफी संख्या में भंडारे लगाए गए थे। जैसे-जैसे दिन बढ़ते जा रहे हैं यहां भंडारे की संख्या में कम होती जा रही है। लगभग सारे भंडारे यहां से उठ चुके हैं। सिर्फ प्रशासन और एक दो संगठनों के ही भंडारे चल रहे हैं।