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नवरात्रि 2018: घर बैठे कीजिए मां के ऐसे मंदिरों के दर्शन, जहां होते हैं कई चमत्कार

Sat, 13 Oct 2018 08:50 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून Updated Sat, 13 Oct 2018 08:50 AM IST
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navratri 2018 mysterious and Wondrous temple of goddess
kalinka temple

उत्तराखंड के नई टिहरी से पांच किमी दूर 57 परिवारों वाले बटखेम गांव में मां कालिंका का भव्य मंदिर है। यहां माता की डोली खुद आह्वान कर भक्त को अपने पास बुलाती है। कहा जाता है कि यहां आने से सारी परेशानियां दूर हो जाती है। हर रविवार को मंदिर में पूजा-अर्चना होती है। खास बात यह है कि माता खुद आपकी मनोकामना बताती हैं। इतना ही नहीं उनका समाधान भी खुद करती हैं। यह चमत्कार ही है कि मां काली की डोली भक्तों की मनोकामना को दीवार पर लिखती है। कहा जाता है कि देवी का पश्वा अपने हाथों पर सूखे चावलों को भिगोकर हरियाली में बदल देता है। इसके बाद अपने छत्र से दीवार पर उसकी समस्या और उसका समाधान लिखती हैं। मान्यता है कि माता के दर पर आने वाले कई निसंतान दंपति को संतान का सुख जरूर मिलता है। यहां केवल भारत से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी श्रद्धालु आते हैं।

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dhari devi temple

उत्तराखंड में बदरीनाथ-केदारनाथ यात्रा मार्ग के मुख्य पड़ाव से 15 किमी की दूरी पर स्थित चमत्कारिक इस मंदिर में मूर्ति दिन में तीन बार रूप बदलती हैं। यह मूर्ति एक देवी मां की है। जो देवभूमि उत्तराखंड की रक्षक के रूप में जानी जाती हैं। अलकनंदा नदी के तट पर स्थित सिद्धपीठ मां धारी देवी के मंदिर में रोजाना यह चमत्कार होता है। कहते हैं यहीं मां काली की कृपा से महाकवि कालिदास को ज्ञान मिला था। शक्ति पीठों में कालीमठ का वर्णन पुराणों में मिलता है। मां काली कल्याणी की यह मूर्ति वर्तमान में अलकनंदा नदी पर जल-विद्युत परियोजना के निर्माण के चलते नदी से ऊपर मंदिर बनाकर स्थापित की गई है। मंदिर में दर्शन करने वाले लोगों का कहना है कि यहां मां काली प्रतिदिन तीन रूप बदलती है। वह प्रात:काल कन्या, दोपहर में युवती व शाम को वृद्धा का रूप धारण करती हैं।

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kasar devi temple

देवी मां के इस मंदिर की शक्तियों ने नासा को भी हैरानी में डाल दिया है। वैज्ञानिक इस मंदिर का रहस्य आज तक नहीं सुलझा पाए हैं। पर्यावरणविद डॉक्टर अजय रावत ने भी लंबे समय तक इस पर शोध किया है। उन्होंने बताया कि कसारदेवी मंदिर के आसपास वाला पूरा क्षेत्र वैन एलेन बेल्ट है, जहां धरती के भीतर विशाल भू-चुंबकीय पिंड है। इस पिंड में विद्युतीय चार्ज कणों की परत होती है जिसे रेडिएशन भी कह सकते हैं। पिछले कई सालों से नासा के वैज्ञानिक इस बैल्ट के बनने के कारणों को जानने में जुटे हैं। इस वैज्ञानिक अध्ययन में यह भी पता लगाया जा रहा है कि मानव मस्तिष्क या प्रकृति पर इस चुंबकीय पिंड का क्या असर पड़ता है। अब तक हुए इस अध्ययन में पाया गया है कि अल्मोड़ा स्थित कसारदेवी मंदिर और दक्षिण अमेरिका के पेरू स्थित माचू-पिच्चू व इंग्लैंड के स्टोन हेंग में अद्भुत समानताएं हैं। इन तीनों जगहों पर चुंबकीय शक्ति का विशेष पुंज है।

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choodamani

रुड़की के चुड़ियाला गांव स्थित प्राचीन सिद्धपीठ चूड़ामणि देवी मंदिर में नवरात्रों के मौके पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। क्षेत्रवासियों के अलावा दूर दराज से श्रद्धालु आकर मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर माता के दर्शन कर मन्नतें मांग रहे हैं। मंदिर के पुजारी के अनुसार यह प्राचीन मंदिर सिद्धपीठ के रूप में मान्यता रखता है। पुत्र प्रप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति मंदिर में आकर माता के चरणों से लोकड़ा (लकड़ी का गुड्डा) चोरी करके अपने साथ ले जाते हैं और पुत्र रत्न प्राप्ति के बाद अषाढ़ माह में अपने पुत्र के साथ ढोल नगाड़ों सहित मां के दरबार मे पहुंचते हैं। यहां भंडारे के साथ ही दंपति ले जाए हुए लोकड़े के साथ ही एक अन्य लोकड़ा भी अपने पुत्र के हाथों से चढ़वाते हैं। यह प्रथा सदियों से चली आ रही है।

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devi mathiyana temple

उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद स्थित मां मठियाणा देवी मंदिर की प्राचीन लोक कथाओं के अनुसार मां मठियाणा सिरवाड़ी गढ़ के राजवंशों की धियान थी। जिसका विवाह भोट यानि तिब्बत के राजकुमार से हुआ था। सौतेली मां द्वारा ढाह वश के कुछ लोगों की मदद से उसके पति कि हत्या कर दी जाती है। पति के मरने की आहत सहजा तिलवाड़ा सूरज प्रयाग में सती होने जाती है। तब यहीं पर मां प्रकट होती है। देवी सिरवाड़ी गढ़ पहुंचकर दोषियों को दंड देती हैं। हर तीसरे साल यहां सहजा मां के जागर लगते हैं। जिसमें देवी की गाथा का बखान होता है।

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