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महज 26 साल की उम्र में शंकराचार्य बने थे स्वामी सत्यमित्रानंद, जानिए उनके जीवन की खास बातें...

Wed, 26 Jun 2019 04:45 PM IST
अलका त्यागी राजेश शर्मा, अमर उजाला, हरिद्वार
राजेश शर्मा, अमर उजाला, हरिद्वार Published by: अलका त्यागी Updated Wed, 26 Jun 2019 04:45 PM IST
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Mahamandaleshwar Swami satyamitranand giri death know his life story
- फोटो : अमर उजाला

आध्यात्म चेतना के धनी और आरएसएस के प्रबल समर्थक निरंजनी अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि भारत माता को सर्वोच्च मानते थे। यही वजह है कि उन्होंने 36 साल पहले हरिद्वार में 108 फीट ऊंचे भारत माता मंदिर का निर्माण किया था। मंदिर का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने किया था।

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स्वामी सत्यमित्रानंद को 29 अप्रैल, 1960 को अक्षय तृतीया के दिन मात्र 26 वर्ष की आयु में भानपुरा पीठ का शंकराचार्य बना दिया गया। करीब नौ वर्ष तक धर्म और मानव के निमित्त सेवा कार्य करने के बाद उन्होंने 1969 में स्वयं शंकराचार्य पद का त्याग कर दिया।  

Mahamandaleshwar Swami satyamitranand giri death know his life story
स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी - फोटो : अमर उजाला

साथ ही दंडी परंपरा से मुक्त होते हुए अपने दंड को गंगा में विसर्जित कर दिया। उनके शिष्य जूना पीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि महाराज ने उनके निधन को देश के अपूरणीय क्षति करार दिया। देश विदेश से आने वाले इस मंदिर में भारत माता की प्रतिमा के साथ ही देश के तमाम देशभक्तों, संतों की प्रतिमाओं के दर्शनों को पहुंचते हैं। आध्यात्म जगत के बड़े हस्ताक्षर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि छूआछूत के भी प्रबल विरोधी रहे। 

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Mahamandaleshwar Swami satyamitranand giri death know his life story
- फोटो : अमर उजाला

अपने धार्मिक कार्यक्रमों में वे सदैव आदिवासी, वनवासी, अनुसूचित जाति के लोगों का सम्मान किया करते थे। अपने तपोबल और अध्यात्म चिंतन के कारण स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि महाराज की संन्यास के कुछ ही समय बाद देश के प्रतिष्ठित संतों में गिनती होने लगी थी।

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Mahamandaleshwar Swami satyamitranand giri death know his life story
- फोटो : फाइल फोटो

स्वामी सत्यमित्रानंद का जन्म 19 सितंबर, 1932 को आगरा में हुआ था। उनका परिवार मूलरूप से उत्तर प्रदेश के सीतापुर का रहने वाला था। संन्यास से पूर्व उनका नाम अंबिका प्रसाद पांडेय था। उनकी अध्यात्मिक शिक्षा ऋषिकेश में हुई। छोटी उम्र में ही उन्होंने संन्यास की दीक्षा ली।

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