उत्तराखंड के जौनसार बावर जनजातीय क्षेत्र का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा रहा है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने यहीं अपना समय व्यतीत किया था।
निकले थे बकरी खोजने, मिल गई 'पांडवकालीन' गुफा, अद्भुत तस्वीरें
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इसी क्रम में तीन दिन पहले गांव निवासी चरवाहे मोहन सिंह की दो बकरियां जंगल में गुम हो गईं थीं। रात होने पर वो वापस लौट आए और अगले दिन चरवाहे रतनसिंह, मदन सिंह को लेकर वो जंगल में पहुंचा। बकरी को खोजते खोजते तीनों घने जंगल में पहुंच गए। वहां गुफा से आती रोशनी देख सभी आश्चर्यचकित रह गए।
पांडवों की मौजूदगी के साक्ष्य जौनसार में अब भी कई जगह दिखाई पड़ते हैं। पूर्व जिला पंचायत सदस्य विजयपाल रावत की मानें तो कुछ साल पहले यहां विदेशी आए थे और गुफा से कुछ आकृतियां छेनी की मदद से निकालकर अपने साथ ले गए थे। गुफा में छेनी का कुछ हिस्सा फंसा हुआ भी मिला है।
इतिहास पर नजर डालें तो राजधानी देहरादून से 125 किमी दूर यमुना किनारे मौजूद लाखामंडल में ही पांडवों के अज्ञातवास के दौरान छिपकर रहने के पुख्ता साक्ष्य मिले हैं। यहीं पांडवों ने लाख का महल ‘लाक्षागृह’ बनाया था। यहां से बचकर भागने के लिए पांडवों ने सुरंग बनाई थी। कहा जाता है कि यह सुरंग हस्तिनापुर तक पहुंचती है। यहीं पर कौरवों ने पांडवों को जलाने की कोशिश की थी।
यहां लाखों की संख्या में शिवलिंग मिले हैं। इस स्थान को आर्किलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की निगरानी में रखा गया है। लाक्षागृह गुफा के अंदर स्थित शेषनाग के फन के नीचे प्राकृतिक शिवलिंग के ऊपर टपकता पानी यहां की खासियत है।